पाबूजी तथा गोगाजी चौहान
राजस्थान में लोगो में पूजनीय स्थानीय महापुरुष लोकदेवता कहलाते है। इन लोकदेवताओं ने नारी रक्षा, पशु रक्षा तथा धर्म की स्थापना से सम्बंधित जो चमत्कारिक कार्य किये है उन्ही के कारण लोकदेवता की उपाधि तथा सम्मान प्राप्त हुआ है। ये राज्य के गांव गांव में क्षेत्रीय मान्यता के अनुसार पूजे जाते है।
देवरे :- राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रो में लोक देवता के बने पूजा स्थल। इन्हे थान या देवल भी कहते है।
1. पाबूजी :-
पाबूजी का सम्बन्ध कोलुमण्ड फलोदी (जोधपुर) से है। इनका वंश खंगारोत वंशीय राजपूत है या राठौड़ है। इनके पिता का नाम धांधल जी राठौड़ था तथा माता का नाम कमलादे है तथा इनकी माता का नाम सुप्यारदे था जो की अमरकोट सोढा राजा सूरजमल की पुत्री थी। पाबूजी को ऊँटो का देवता कहा है , इनका विवाह अमरकोट सोढा राजा सूरजमल की पुत्री सुप्यारदे के साथ जब हो रहा था तब ये फेरो से उठकर अपने बहनोई जींदराव के साथ देवल चारणी की गाये छुड़ाने चल दिए। ये देचू गांव में युद्ध (1276 ई.) में वीरगति को हुए।
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पाबूजी प्लेग रक्षक तथा ऊँटो के देवता में पूजे जाते है। पाबूजी को मारवाड़ में ऊँट लाने का श्रेय है। ऊँट पालक राइका (रेबारी) जाति इन्हे अपना आराध्य मानती है साथ ही थोरी और भील जाति में भी ये लोकप्रिय है। पाबूजी केसर कलमी घोड़ी बायीं और झुकी पाग लिए प्रसिद्द है। इनका प्रतीक चिन्ह भाला है।
कोलुमण्ड में इनका प्रसिद्द मंदिर है जहा प्रसिद्द चैत्र अमावस्या को इनका मेला भरता है। पाबूजी के पवाडे नायक और रेबारी जाति द्वारा गाये जाते है।
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पाबूजी की फड़ - नायक या आयडी जाति के भोपे रावण हत्था नामक वाद्य यंत्र पर इस फड़ का वाचन करते है। यह सबसे लोकप्रिय फड़ है। फड़ में सामने भाले का चित्र है साथ ही पाबूजी की घोड़ी केसर कलमी काले रंग चित्रित की जाती है।
2. गोगाजी चौहान :-
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| गोगाजी चौहान |
गोगाजी चौहान सम्बन्ध ददरेवा (चूरू) से है , गुरु का नाम गोरखनाथ था। इनका स्वरुप अश्वारोही था। गोगाजी को नागो का देवता तथा जाहर पीर के नाम से जाना जाता है। गोगाजी की शीश मेढ़ी ददरेवा (चूरू ) तथा धड़ मेढ़ी नोहर (हनुमानगढ़) में है। इनका जन्म चूरू जिले के ददरेवा नामक स्थान पर हुआ। पिता का नाम जेवर सिंह तथा माता का नाम बाछल था। इनकी पत्नी का नाम केलमदे था जो की कोलमुण्ड की राजकुमारी थी। इनका जन्म भादो कृष्ण नवमी को हुआ था जिसे गोगा नवमी भी कहा जाता है।
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इन्होने गौ-रक्षा तथा मुस्लिम आक्रमण कारी महमूद गजनवी से युद्ध करते हुए देश रक्षा हेतु अपने प्राण दिए। ये सांपो के देवता माने जाते है साथ ही जाहरपीर के नाम से भी प्रसिद्द है।
गोगामेड़ी जो की इनका समाधि स्थल है नोहर (हनुमानगढ़) में स्थित है। यहाँ प्रतिवर्ष विशाल मेला गोगानवमी को लगता है। गोगा मेढ़ी की बनावट मकबरानुमा है , इसके प्रवेश द्वार पर बिस्मिल्लाह अंकित है। महाराजा गंगा सिंह ने वहां गोगाजी की प्रतिमा स्थापित कर उसे मंदिर का स्वरुप दिया।
सांचौर (जालोर) में भी गोगाजी की ओल्डी नामक स्थान पर गोगाजी का मंदिर है।
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