hindi stories-दोस्ती की असली परख तथा तेनालीराम की चतुराई



पाठको! आपके द्वारा हिंदी कहानियो को पसंद करने के लिए धन्यवाद। हमारे द्वारा आपके लिए समय समय पर रोचक तथा सार्थक पूर्ण कहानिया प्रस्तुत की गई है।  इसी तरह हमारा मनोबल बढ़ने के लिए आपका धन्यवाद !

दोस्ती की असली परख 


एक बार की बात है , एक बकरी थी। वो बकरी ख़ुशी ख़ुशी अपने गांव में रहती थी।  सभी जानवरो से उसका मिलनसार व्यव्हार था , इसी कारण बहुत सारी बकरिया तथा बहुत से अन्य जानवर उसके मित्र थे।  उसकी किसी से किसी भी प्रकार की कोई दुश्मनी नहीं थी।  वो सभी से बात करना पसंद करती थी और जल्दी ही सभी को अपना दोस्त भी मान लेती थी।
 गांव के लोग भी उस बकरी को बहुत प्यार करते थे और उसे खाने की चीजों का प्रबंध करवा देते थे। उसका व्यवहार ही गांव वाले लोगो के लिए बहुत स्नेहपूर्ण था।

जल्द ही उसकी कुछ सहेलिया बन भी गई परन्तु उसने दोस्ती की परख नहीं की। वो दोस्ती में इतनी पागल वो गई की उसने गांव वाले लोगो से अपना सम्बन्ध भी तोड़ दिया और केवल अपने सहेलियों के समूह में ही रहने लगी , गांव वालो ने उसे समझाया भी परन्तु वह एक न मानी।

एक बार उस गांव में एक मेला लगा जहा वो सभी बकरिया मेला देखने गई , वो सभी बकरिया जानती थी की उनकी बकरी मित्र उनके किये जान भी दे सकती है और वो सभी खाने की लालची थी अतः जी भरकर उन्होंने उस बकरी से खर्चा कराया और पेट पूजन किया।  उस बकरी ने भी उन बातो पर बिलकुल भी गौर नहीं किया।

सभी कुछ अच्छा चल रहा था।  लेकिन एक बार वो बकरी बीमार पड़ गई , धीरे धीरे उसकी बीमारी बढ़ती चली गई और इस तरह धीरे धीरे उसका शरीर कमजोर पड़ गया।  इस कमजोरी के कारण उसका घर से निकलना सा बंद ही हो गया और वो पूरा समय घर पर ही बिताने लगी। परन्तु बकरी को एक चिंता सताए जा रही थी बकरी ने जो खाना पहले से अपने लिए जमा करके रखा था, अब वो भी ख़त्म होते जा रहा था। 

परन्तु उसे विश्वास था की उसकी बकरी सहेलिया उसके लिए खाने का प्रबंध अवश्य कर देगी और साथ ही उसका इलाज भी करवा देगी और वो पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाएगी।  जल्द ही वो दिन भी आ गया।

एक दिन उसकी कुछ बकरिया सहेली उसका हाल चाल पूछने उसके पास आई, तब ये बकरी बड़ी खुश हुई।  उस बकरी ने सोचा की अपनी सहेलियों से कुछ और दिन का खाना मंगवा लेगी।  लेकिन वे बकरिया तो उससे मिलने के लिए अंदर आने से पहले ही उसके घर के बाहर रुक गई और उसके आँगन में रखा उसका खाना खाने लगी।
उस बकरी ने उन्हें  रोकने की कोशिश की पर फिर सोचा की अगर मै इनसे खाना मांगने वाली थी तो क्या ये मेरे यहाँ खाना नहीं खा सकती।

बकरी को बुरा तो लगा परन्तु उसे एक बात समझ आ गई कि उसने जीवन में गलती क्या की ? अब वो सोचने लगी की काश ! हर किसी को अपने जीवन का हिस्सा तथा दोस्त बनाने से पहले उसने उन्हें थोड़ा परख लिया होता तो अब इस बीमारी में उसकी मदद के लिए कोई तो होता।

अंत में गांव के लोगो ने उस बकरी का इलाज करवाया तथा उसके भोजन का प्रबंध करते हुए उसे अपने साथ ही रख लिया , बकरी भी इसके लिए राजी हो गई और उसने कभी दुबारा उन बकरियों से कोई सम्बन्ध नहीं रखा।



तेनालीराम की चतुराई 


एक बार गोलकुंडा के राजा ने सम्राट कृष्णदेव राय की हत्या का षड्यंत्र रचने के लिए एक जासूस भेजा।  वह जासूस सीधे तेनालीराम के घर पंहुचा। उसे मालूल था की राजा तेनालीराम को बहुत चाहते है। 

उसने तेनालीराम को कहा की वह उसका दूर का रिश्तेदार है और विजयनगर घूमने आया है। तेनाली ने उसे अपने घर पर ठहरा लिया। 

एक दिन जासूस ने तेनाली की हस्तलिपि में राजा के नाम एक पत्र लिखा।  पत्र में उसने सम्राट को तेनाली के घर आने के लिए निमंत्रण दिया। रात को राजा तेनाली के घर पहुंचे। जैसे ही वह घर में घुसने लगे वैसे ही जासूस ने उन पर पैने छुरे से आक्रमण कर दिया पर सम्राट के सैनिको की सतर्कता से वह पकड़ लिया गया। 

सम्राट कुछ समझ न पाए। उन्होंने सोचा की तेनाली भी इस षड्यंत्र में शामिल है। उन्होंने तेनाली और जासूस दोनों को मृत्यु दंड देने की सजा सुनाई। 

जल्लाद दोनों को फांसी के तख़्ते पर चढाने के लिए ले गए।  वह राजा भी मौजूद थे।  उन्होंने तेनाली से पूछा "तुमने कई बार मेरी जान बचाई है। फिर तुम क्यों इस षड्यंत्र में शामिल हुए ? अच्छा बताओ, तुम किस तरह मरना चाहते हो ?"

तेनाली ने हंस कर कहा -"वचन दीजिये की आप मेरी मर्जी के अनुसार मझे फांसी पर चढ़ाएंगे। "

सम्राट ने कहा , "मंजूर है। "

"तो महाराज, आप मुझे अपनी मौत मरने दीजिये, यानि जब तक मेरी मौत न आये जब तक मै जिन्दा रखा जाऊ। "

सम्राट निरुत्तर हो गए।  कुछ सोच कर उन्होंने तेनाली की बात मान ली, पर उसे कैद ही रखा।  कुछ समय बाद सम्राट को वास्तविकता का पता चला। उन्होंने फ़ौरन तेनाली को मुक्त करने का आदेश दिया। 















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