राजस्थान के प्रसिद्द शिलालेख



राजस्थान के प्रसिद्द शिलालेख


प्राचीन खण्डर तथा मुद्राओ की भाँति राजस्थान की जानकारी के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत शिलालेख मने गए है , इन शिलालेखों के द्वारा किसी राज्य, क्षेत्र तथा शासको के बारे में जानकारी मिलती है।

राजस्थान के प्रसिद्द शिलालेख
राजस्थान के प्रसिद्द शिलालेख


1.बड़ली का शिलालेख  :-

अजमेर के बड़ली से प्राप्त यह राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख माना जाता है जो ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है।  भारत का सबसे प्राचीन शिलालेख पिप्रहवा (इलाहबाद) का था।  इस शिलालेख के द्वारा अजमेर तथा मध्यमिका में जैन धर्म के विस्तार की जानकारी मिलती है।

2. घोसुण्डी का शिलालेख :-

चित्तौड़ के पास घोसुण्डी गांव से यह शिलालेख प्राप्त हुआ। इस शिलालेख की भाषा संस्कृत तथा लिपि ब्राह्मी थी।  इस शिलालेख की प्रमुख उपलब्धि 'अश्वमेघ यज्ञ' का उल्लेख होना है।  राजस्थान के इस शिलालेख से हमें सर्वप्रथम 'भगवत धर्म' का उल्लेख मिलता है।


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3. गंगधार शिलालेख :- 

झालावाड़ जिले से प्राप्त इस शिलालेख में तांत्रिक विधियों का उल्लेख मिलता है।  इस शिलालेख की विशेष उपलब्धि यह है की इसमें पांचवी शताब्दी में प्रचलित 'सामंतवादी व्यवस्था' का वर्णन किया गया है।

4. मानमोरी शिलालेख :-

यह शिलालेख चित्तौड़ के समीप मानसरोवर झील के समीप कर्नल टॉड को प्राप्त हुआ।  इस शिलालेख को शंकर घट्टा के नाम से भी जानते है। इसमें अमृत मंथन की व्याख्या की गई।  कर्नल जेम्स टॉड ने लंदन जाते समय इस शिलालेख को समुंद्र में फेंक दिया था। 


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5. बिजोलिया का शिलालेख :-

यह संस्कृत भाषा में रचित है , यह शिलालेख पार्श्वनाथ की चट्टान पर उत्कीर्ण है। बिजोलिया का प्राचीन नाम विंध्यावली था।  इस शिलालेख में बीसलदेव के शासन काल को स्वर्णकाल कहा गया है।  इस शिलालेख की रचना गुणभद्र नामक व्यक्ति ने की , इस शिलालेख में चौहानो को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है। 

6. चीरवे का शिलालेख :- 

 यह शिलालेख उदयपुर के चीरवा नामक गांव से प्राप्त हुआ है , इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि नागरी है।  इसमें उत्कीर्ण 51 श्लोको से मेवाड़ के प्रारंभिक गुहिलवंशीय शासको, विष्णु मंदिर की स्थापना तथा शिव मंदिर के लिए दिए गए भू- अनुदान की जानकारी मिलती है। 

7. रणकपुर शिलालेख :- 

यह शिलालेख चौमुखा मंदिर के स्तम्भ पर 47 पंक्तियों में लिखा हुए है।  इसकी भाषा संस्कृत तथा लिपि नागरी है।  इस शिलालेख के द्वारा बाप्पा रावल तथा कालभोज को अलग अलग व्यक्ति होना बतलाया गया है।  इस शिलालेख में राणा कुम्भा  की विजय का वर्णन है। 

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8 . कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति :-

महेश भट्ट द्वारा रचित इस शिलालेख में बाप्पा रावल से लेकर खम्भा के शासनकाल का विस्तृत वर्णन किया गया है।  इस शिलालेख में राणा कुम्भा की प्रमुख विजय वर्णित है जैसे मालवा विजय, गुजरात विजय, मांडू विजय तथा चंपा विजय। इस शिलालेख से कुम्भा की उपाधियों की जानकारी मिलती है जैसे - अभिनव भरताचार्य, हालगुरु, शैलगुरु, दानगुरु तथा महासंगीतराज।

9.  राज प्रशस्ति :- 

राजसमंद झील की नौ चौकी की पाल पर लगी 25 शिलाओं पर संस्कृत में खुदवाई गई यह प्रशस्ति महाराणा राजसिंह प्रथम के समय की है। इस प्रशस्ति के लेखक रणछोड़ भट्ट है। इस प्रशस्ति में बप्पा रावल से लेकर राजसिंह तक के काल की उपलब्धियों का वर्णन किया गया है।  इसी प्रशस्ति में दिवेर तथा हल्दीघाटी युद्ध का भी पता चलता है। इसमें महाराणा अमर सिंह द्वारा मुगलो से की गई 1615 ई. की संधि का भी पता चलता है। 

10.  आमेर का शिलालेख :-

इस शिलालेख में प्रारंभिक कछवाह शासको से लेकर मानसिंह तक का वर्णन किया गया है।  इसमें कछवाह वंश की राजधानी जमवारामगढ़ का उल्लेख मिलता है।  इस शिलालेख में आमेर के कछवाह शासको को रघुवंश तिलक कहा गया है। 


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