हाड़ौती का चौहान वंश
राजस्थान का दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र जिसमे कोटा और बूंदी शामिल है को हाडा चौहानो द्वारा शाषित होने के कारण हाड़ौती कहा जाता है। प्रारम्भ में बूंदी पर मीणाओं का अधिकार था। बूंदा मीणा के नाम पर बूंदी क का नामकरण हुआ। कुम्भाकालीन रणकपुर लेख में बूंदी ' वृन्दावती' मिलता है।
बम्बावड़े के सामंत चौहान वंशीय देवा हाडा ने मीणाओं को पराजित कर 1241 ई. में बूंदी राज्य की स्थापना की। देवा के उत्तराधिकारी समर सिंह हाडा ने 1264 ई. में कोटिया शाखा में भीलो को परास्त कर कोटा पर अधिकार किया और उसके पुत्र जैत्र सिंह हाडा ने कोटा के किले का निर्माण किया और वह प्रसिद्द गुलाब महल का निर्माण करवाया।
समर सिंह का उत्तराधिकारी नापुजी था, जो 1304 ई. में अलाउदीन खलजी से लड़ते हुए मारा गया। बूंदी के बर सिंह हाडा ने 1354 ई. ने तारागढ़ किले का निर्माण करवाया।
सुर्जन हाडा (1554-1585 ई.)
इसके पूर्व बूंदी के शाशक मेवाड़ के अधीन थे। इसने मेवाड़ से सम्बन्ध विच्छेद कर स्वतंत्र सत्ता स्थापित की और रणथम्भोर पर अधिकार कर अपनी शक्ति में वृद्धि की। बनारस हुए सुर्जन हाडा ने कई सुन्दर इमारतों, जलाशय, महल गंगा नदी के घाट पर बनवाये। द्वारिकापूरी द्वारा निर्मित रणछोड़जी का मंदिर प्रसिद्द है। 1585 में बनारस में ही इसकी मृत्यु हो गई।
राव भोज ( 1585-1607 ई.)
इसने उड़ीसा, गुजरात और अहमदनगर के घेरे के समय सेना के साथ परिचय दिया। अकबर ने इसकी वीरता से प्रसन्न होकर इसे पुरस्कार और पदोन्नति सम्मानित किया।
यह भी पढ़े - राजस्थान के भौतिक भू भाग
राव रतन सिंह (1607-1621 ई.)
जहाँगीर ने इसे 5000 का मनसब दिया तथा न्यायप्रिय होने के कारण इसे रामराज और चित्रकला प्रेमी होने के कारण सरबुलंदराय की उपाधि दी। इसने खुर्रम के विद्रोह को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राव शत्रुशाल (1621-1658 ई.)
मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने इसे राव की पदवी , तीन हजार जात तथा दो हजार का मनसब दिया। मुग़ल उत्तराधिकार युद्ध के दौरान दारा के पक्ष में युद्ध करते हुए सामूगढ़ में गोली लगने से वीरगति को प्राप्त हुआ। शत्रुशाल की स्मृति में इसके पुत्र अनिरुद्ध हाडा ने बूंदी में चौरासी खम्भों की छतरी का निर्माण करवाया।
यह भी पढ़े - राजस्थान की स्थिति और विस्तार
राव भावसिंह (1658-1681 ई.)
प्रारम्भ में इसे औरंगजेब की मान्यता नहीं मिली तथा इसके विरुद्ध मुग़ल सेना भेजी गई जिसे इसने खातोली में परास्त किया। इसके बाद आगरा बुलाकर तीन हजार जात और दो हजार का मनसब प्रदान किया साथ ही बूंदी की जागीर देकर सम्मानित किया।
राव अनिरुद्ध (1681-1695 ई.)
1688 में राजाराम जाट के खिलाफ लड़े युद्ध शाही सेना के साथ था। इनकी पत्नी रानी नथावती ने बूंदी में 'रानीजी की बावड़ी' करवाया। इसका पुत्र जोधसिंह हाडा 1706 ई में जैतसागर तालाब में गणगौर के अवसर पर नाव करते हुए अपनी पत्नियों और गणगौर प्रतिमा सहित डूब गया। तभी से "हाडो ले डूब्यो गणगौर" विख्यात हो गया।
राव राजा बुद्ध सिंह (1695-1739 ई.)
औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार युद्ध में इसने बहादुर शाह प्रथम का साथ दिया। 1729 में जयपुर नरेश जयसिंह द्वितीय से झगड़ा हो गया तो जयसिंह ने बुद्धसिंह को हटाकर दलेलसिंह को पर बैठा दिया। यही 1734 ई. में मराठो के राजस्थान प्रवेश का कारण बनी जब इसकी पत्नी ने राखी भेजकर बूंदी आमंत्रित किया। इसी के शासन काल में मुग़ल शासक फर्रुखसियर ने बूंदी का नाम बदलकर फरुखाबाद कर दिया।
उम्मेद सिंह
कोटा के शासक और होल्कर की सहायता से इसने बूंदी की गद्दी प्राप्त की। यह मल्हार राव होल्कर को मामा कहता था क्योकि इसकी माता कछवाही रानी ने मल्हार राव को राखी थी। उम्मेद सिंह ने बूंदी के तारागढ़ किले में चित्रशाला का निर्माण करवाया। इसने अपने जीवनकाल में स्वयं की सोने की मूर्ति बनाकर उसका अंतिम संस्कार करवाया।
- बूंदी के शासक विष्णु सिंह हाडा ने 1818 ई. को अंग्रेजो से संधि कर अधीनता स्वीकार ली।
- 1857 ई. की क्रांति के समय बूंदी का शासक रामसिंह हाडा एकमात्र शासक था जिसने अंग्रेजो का सहयोग नहीं दिया।
- रामसिंह के समय प्रसिद्द कवि वंश भास्कर के रचनाकार सूर्यमल्ल मिश्र हुए।
- बूंदी का अंतिम शासक बहादुर सिंह हाडा था।
यह भी पढ़े - महाराणा कुम्भा (कुम्भकर्ण)

0 comments:
Post a Comment