तेजाजी तथा देव नारायण जी



तेजाजी तथा देव नारायण जी 



तेजाजी

तेजाजी


तेजाजी 

तेजाजी का जन्म खड़नाल  (नागौर) में हुआ था। ये नागवंशीय जाट थे ,इनकी पत्नी का नाम प्रेमलदे था। इनके पिता का नाम ताहड जी था तथा इनकी माता का नाम रामकुंवरी था। प्रेमलदे की सखी लाछा गुजरी की गायों को मेरो से छुड़वाते समय अपने प्राण त्याग दिए। तेजाजी को सांपो के देवता तथा काला-बाला देवता के नाम से जानते है। 

इनका जन्म नागवंशीय जाट परिवार में 1074 ई. में नागौर जिले के खड़नाल में ताहड जी और रामकुंवरी के यहाँ पर हुआ था। गायो के मुक्तिदाता तथा नागो के देवता के रूप में पूज्य तेजाजी के अजमेर जिले के लगभग हर गांव में चबूतरे है। इनके चबूतरे पर पत्थर पर एक घुड़सवार तथा सर्प का चित्र उत्कीर्ण है। 


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ये धौलिया वीर कहलाते है।  इनके पुजारी को घोड़ला तथा चबूतरे को थान कहते है। तेजाजी की मूर्तियों के उत्कीर्णन में तलवार धारी अश्वारोही योद्धा के रूप में चित्रित किया जाता है। इनकी जिह्वा को सर्प द्वारा दंशित करते हुए प्रदर्शित किया जाता है। सैंदरिया को तेजाजी का मूल स्थान माना जाता है क्योकि यही इन्हे नाग देवता ने डसा था। 

लाछा गुजरी की गायो को मेर के मीणाओ से छुड़ाने में जीवन की आहुति दी। इनकी मृत्यु का समाचार घोड़ी लीलण द्वारा उनके घर पहुंचाया गया।  इन्हे कृषि कार्यो का उपकारक देवता भी माना जाता है। साँप, कुत्ते या अन्य जहरीले कीड़े द्वारा काटे जाने पर तेजाजी की पूजा की जाती है। 


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वीर तेजाजी के प्रमुख मंदिर सुरसरा (अजमेर ), सौन्दर्या (अजमेर), जावता (अजमेर), खड़नाल (नागौर), पुराड़ा (नागौर) तथा परबतसर (नागौर) में स्थित है।  तेजाजी की पत्नी परबतसर (नागौर) में इनके साथ सती हो गई थी। 

देवनारायण जी 

देव नारायण जी
देव नारायण जी 


देवनारायण जी का जन्म भीलवाड़ा की आसींद तहसील में हुआ। इनके पिता का नाम सवाई भोज तथा माता का नाम सेठू खटानी था। ये गुर्जर समाज के आराध्य देव है।  गुर्जर जाति के लोग इन्हे विष्णु का अवतार मानते है।  देवनारायण जी का मेला भाद्रपद सप्तमी को लगता है।  ये नागवंशीय गुर्जर परिवार से थे। 

देव नारायण जी ने जनता के दुखो को दूर करने के लिए अपने पराक्रम तथा सिद्धियों का प्रयोग कर सहयोगियों के साथ तत्कालीन आतंक तथा अत्याचार को दूर किया।  इन्होने देवमाली (ब्यावर) में देह त्यागी।  देवनारायण जी को आयुर्वेद का ज्ञाता माना गया है।


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इनके प्रमुख मंदिर आसींद (भीलवाड़ा), जोधपुरिया (टोंक) तथा देवास (मध्य प्रदेश ) में है , देवनारायण जी का मूल देवरा आसींद (भीलवाड़ा) में है , इनके प्रमुख देवरे देवमाली (ब्यावर), देवधाम (जोधपुरिया) तथा देव डूंगरी पहाड़ी (चित्तौड़ ) में है। 

देवनारायण जी की फड़- देवनारायण जी फड़ गुर्जर भोपो दवरा जंतर नामक वाद्य यंत्र पर बाची जाती है। फड़ चित्रांकन में 'सर्प' का चित्र होता है तथा इनकी घोड़ी 'लीलागर' को हरे रंग से चित्रित किया जाता है।  यह सबसे पुरानी, सबसे अधिक चित्रांकन वाली और सबसे लम्बी फड़ है। 


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डाक विभाग ने 2*2 सेमी लम्बी देवनारायण की फड़ डाक टिकट के रूप में देवनारायण जयंती पर 2 सितम्बर 1992 को जारी की।  
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