hindi stories-अग्नि परीक्षा



अग्नि परीक्षा 

एक बार कश्मीर में राजा मेघवाहन का राज था।  वे प्रजा को पुत्र की तरह प्यार करते थे।  प्रजा को अभय दान दिया हुआ था क्योकि वे मानते थे की इससे बढ़कर राजा का और कोई धर्म नहीं है।  

एक बार राजा दिग्विजय के लिए निकल पड़े।  सारा राज्य उनकी छत्रछाया में रहना पसंद करता है या नहीं ! इसका निरिक्षण करने निकले थे।  

वे घूमते घूमते समुद्र तट के पास पहुंच गए।  उनकी सेना एक वन में पड़ाव डाले हुए पड़ी थी।  एकाएक उन्हें एक आवाज सुनाई दी और उन्हें करुण स्वर सुनाई दिया , उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उन्हें रक्षा के लिए पुकार रहा हो।  राजा तुरंत घटनास्थल पर जा पहुंचे।  उन्होंने देखा की एक व्याध एक बालक की बलि देने जा रहा था।  

ऐसा देखते ही राजा ने कहा-"ठहरो ! मेरे राज्य में नर हत्या नहीं हो सकती। " व्याध घबराया , हाथ जोड़कर बोला - "महाराज कृपा कीजिये, इस कार्य के लिए मै  विवश हु।  इसके बिना मेरा बच्चा बच नहीं सकता , क्योकि मैंने कानो से आकाशवाणी सुनी है की जब तक तुम नर बलि नहीं दोगे, तब तक तुम्हारा बच्चा बच नहीं सकता। अतः मेरा कृत्य हत्या नहीं है , यह तो बलि है। "

राजा ने फटकारते हुए व्याध से पूछा-"अपने बच्चे को बचाने के लिए किसी दूसरे बच्चे की हत्या करना क्या उचित समझते हो ?" व्याध के पास कोई उत्तर नहीं था।  उस पर मुर्दनी छा गई।  उसकी आखो में निराशा झाँकने लगी।  

वह हाथ जोड़कर बोला -" महाराज ! मेरे और मेरी स्त्री के प्राण मेरे बच्चे में बस्ते है।  यदि मेरे बच्चे को बचाया नहीं गया तो हम दोनों भी नहीं बच सकते।  इस तरह तीन प्राणियों के बचाव के लिए यदि एक प्राणी की बलि हो जाये तो उतना अनुचित नहीं कहा जा सकता यदि महाराज आप एक की रक्षा करेंगे तो तीन लोगो की मृत्यु निश्चित होगी।  हम तीनो भी आपसे अपने जीवन की मांग करते है। " 

राजा ने कहा -"ठीक है , पर इस बालक को तो छोड़ ही दो। : व्याध ने कहा -"महाराज! तब तो हम तीनो के प्राण नहीं बच सकेंगे। "

तभी वह बालक बोला -"महाराज! आपके राज्य में मुझ निरपराध की हत्या हो रही है, दया करके मुझे बचाइये। "
बालक की पुकार से राजा का मन पसीज गया।  उन्होंने व्याध से पुनः कहा-"तुम घबराओ नहीं, हमारा कर्तव्य है प्रजा का पालन करना।  

जिस तरह यह अनाथ बालक मेरे लिए मेरी प्रजा है उसी तरह तुम तीनो भी मेरे लिए मेरी प्रजा हो।  बालक के साथ साथ मई तुम तीनो को भी बचाना चाहता हु। यह तलवार लो , इससे मेरी बलि दे डालो। "

व्याध ने कहा-" महाराज! आप आवेश में आकर बिना कुछ सोचे ही कार्य करने जा रहे है।  आपकी जान तो हम तीन जानो से अधिक मूल्य वान है।  एक अनाथ बालक की रक्षा करके आप तो सैंकड़ो लोगो को अनाथ करने जा रहे है। " राजा ने कहा- "धर्म का तत्व मै भी जनता हु।  तुम उपदेश देने की व्यर्थ चेष्ठा न करो।  जो मै कहता हु , बस वही करो। "
इतना कहकर राजा म्यान से तलवार खींचकर, सिर झुकाकर स्वयं अपने गले पर वार करना ही चाहते थे की किसी ने उनका हाथ थाम किया।  एक विचित्र प्रकाश सब जगह व्याप्त हो गया। उस प्रकाश में न तो बालक न ही व्याध नजर आ रहे थे।  

कुछ दिव्य पुरुष उस प्रकाश में नजर आने लगे।  उन्होंने कहा-" राजा मेघवादन ! आपके प्रजापालन की यह अग्निपरीक्षा थी।  राजाओ को ऐसी अनेक परीक्षाओ से उत्तीर्ण होना चाहिए। "

जब तक आप जैसे राजा इस राज्य पर मौजूद है तब तक इस राज्य को किसी भी परेशानी का सामना नहीं करना होगा।  








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