राजस्थान की महत्वपूर्ण सभ्यताये
गणेश्वर सभ्यता : सीकर जिले की नीम का थाना तहसील में कांतली नदी के तट पर गणेश्वर टीला की खुदाई 1977-78 में रतनचंद्र अग्रवाल और विजयकुमार के नेतृत्व में हुई। यह सभ्यता लगभग 2800 ई पू की है।
यह तिथि ताम्रयुगीन सांस्कृतिक केन्द्रो से प्राप्त तिथियों में प्राचीनतम है। इसे भारत में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी माना गया है।
यह सभ्यता सीकर, झुंझुनू, जयपुर तथा भरतपुर तक फैली हुई थी। यहाँ से कुल्हाड़ी, तीर, भले, सुइया, मछली पकड़ने के कांटे, चूडिया तथा विविध ताम्र आभूषण है।
सीकर का प्राचीन नाम वीर भान का बास था। इस सभ्यता के लोग सर्वाहारी थे , खंडेला गांव पुरे भारत में गोटा बनाने के लिए प्रसिद्द है।
लप्पा, लप्पी, किरण, बकड़ी, गोटे के अलग अलग प्रकार है। गोटा बनाने वाले समुदाय को नीलगर या रंगरेज कहा जाता है।
बैराठ सभ्यता : जयपुर से लगभग 85 किमी दूर मत्स्य जनपद की राजधानी विराट नगर से मौर्य कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए है। विराट नगर का पहला उत्खनन रियासती समय में दयाराम साहनी ने कराया था तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डॉक्टर नील रत्न बनर्जी ने भी यहाँ खुदाई की।
यहाँ की बीजक की पहाड़ी से कैप्टन बर्ट ने अशोक का आबू शिलालेख खोजा था। 1909 में बीजक की पहाड़ी से एक बौद्ध विहार (गोल मंदिर) तथा अशोक स्तम्भ के साक्ष्य मिले है।
चीनी यात्री हेनसांग ने अपनी यात्रा वृतांत में बैराठ का उल्लेख किया है। विराट नगर से अशोक कालीन ब्राम्ही लिपि के अक्षर युक्त ईंटे प्राप्त हुई है।
बैराठ, प्राचीन कल में मत्स्य प्रदेश की राजधानी थी। महाभारत से बैराठ की जानकारी प्राप्त होती है। इस सभ्यता का उदय बाणगंगा नदी के किनारे मन जाता है। बाणगंगा नदी के उपनाम तीर गंगा, अर्जुन गंगा है।
हेनसांग की पुस्तक सीयूकी में भी बैराठ का उल्लेख है। बैराठ ही मौर्य सभ्यता तथा संस्कृति का केंद्र भी है। बैराठ से महात्मा बुद्ध की जीवंत प्रतिमा मिली है , यहाँ से सोने का कलश मिला है जिसमे बुद्ध की अस्थिया है।
भीनमाल सभ्यता : जालोर जिले में स्थित भीनमाल से 1953-54 में रत्नचन्द्र अग्रवाल द्वारा उत्खनन कार्य करवाया गया। उत्खनन में मृदभांड तथा शक क्षत्रपों के सिक्के मिले है।
यहाँ से रोमन सुरापात्र भी प्राप्त हुआ है। शिशुपाल वध के रचयिता कवि माघ का कार्य क्षेत्र भीनमाल (जालोर) ही था। गुप्तकालीन विद्वान् ब्रह्मगुप्त का जन्म भी भीनमाल में हुआ था।
चीनी यात्री हेनसांग ने भीनमाल की यात्रा की थी।
रेढ़ सभ्यता: यह सभ्यता टोंक जिले से सम्बंधित है। यहाँ से एशिया का सिक्को का सबसे बड़ा भंडार प्राप्त हुआ है। रेढ़ को भारत का टाटा नगरी कहा जाता है।
यहाँ से सन 2008 में खुदाई के दौरान 3075 चांदी के पंचमार्क सिक्के प्राप्त हुए है।
बागौर सभ्यता: यह सभ्यता भीलवाड़ा जिले से सम्बंधित है। श्री मिश्रा जी के निर्देशन में इसका उत्खनन 1967 से 1970 के मध्य किया गया। यह कोठरी नदी के किनारे स्थित है। यहाँ से विश्व के प्राचीनतम पशुपालन के अवशेष प्राप्त हुए है।
गरदड़ा सभ्यता: यहाँ से पक्षी चित्रित (बर्ड राइडिंग ) ईंटे प्राप्त हुई है।
बालाथल सभ्यता: यह सभ्यता उदयपुर की है। वल्लभ नगर तहसील के बालाथल गांव में मिली है। यह सभ्यता 1993 में वी एन मिश्र के निर्देशन में किये गए उत्खनन में एक ताम्र पाषणिक सभ्यता के रूप में प्रकाश में आई। यहाँ से लोहा गलने की 5 भट्टिया प्राप्त हुई है।
कुराड़ा सभ्यता: यह सभ्यता नागौर जिले से संभंधित है। इसे धातु नगरी भी कहा जाता है। यह लोहे के औजार बनाने का केंद्र था।
ईसवाल सभ्यता: उदयपुर जिले से सम्बंधित यह सभ्यता एक प्राचीन औद्योगिक बस्ती थी। यहाँ से लोहा गलने के प्रमाण मिले है मौर्य, शुंग, तथा कुषाण कल में यहाँ लोहा गलने का कार्य होता था , यहाँ से उत्खनन में ऊंट का दन्त मिला है।
रंगमहल सभ्यता: यह सभ्यता सरस्वती तथा दृषवती नदी घाटी में विकसित हुई। इसका उत्खनन 1952-54 में स्वीडन की हन्नारिद के निर्देशन में हुआ। कुषाण शासको के सिक्के मिलने के कारण इसे कुषाणकालीन सभ्यता कहा जाता है।
नगरी सभ्यता: इसकी खोज 1982 में कलाईल के द्वारा हुई तथा यहाँ से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए है।
नगर(टोंक) सभ्यता: टोंक नगर में स्थित नगर के उत्खनन से 6000 मालव सिक्के प्राप्त हुए है। यहाँ से गुप्तोत्तरकालीन स्लेटी पत्थर से बानी महिषासुर मर्दिनी, एकमुखी शिवलिंग, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी आदि की प्रतिमाये प्राप्त हुई है।
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