राजस्थान की प्राचीन सभ्यताए
- कालीबंगा सभ्यता
कालीबंगा सभ्यता का काल 2350 से 1750 ईसा पूर्व माना जाता है। कालीबंगा सभ्यता का उदय घग्गर नदी के किनारे हुआ था। कालीबंगा, हड़प्पा के समकालीन/हड़प्पा से पूर्व/हड़प्पा से बाद की सभ्यता मानी जाती है। कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ "काले रंग की चुडिया" है।
इसकी खोज अमलानंद घोष के द्वारा 1951-52 ईसा में हुआ। इसका उत्खनन ब्रजवासी लाल , बालकृष्ण थापर तथा श्री खरे द्वारा 1961-64 ईसा के मध्य हुआ।
दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को सिंधु सभ्यता की तीसरी राजधानी बताया है। यहाँ की सड़के एक दूसरे को समकोण पर कटती थी जिसे जाल पद्धति कहा जाता है यह विश्व की एकमात्र सभ्यता है जहा गंदे पानी की नालिया लकड़ियों से बनी हुयी थी यह नगरीय सभ्यता मानी जाती है। यहाँ नगर निगम की व्यवस्था थी। कालीबंगा में 5 स्तरों तक खनन किया गया।
यहाँ स्वतंत्रता के बाद भारत में प्रथम बार उत्खनन किया गया। यहाँ से मिटटी के लाल रंग के बर्तन प्राप्त हुए है। यहाँ से 7 अग्नि वेदिकाएं प्राप्त हुयी है , कालीबंगा से ऊट पालने की जानकारी मिलती है। परिवार की मुखिया माता होती थी इसलिए यहाँ एकल परिवार प्रणाली विधमान थी। यहाँ से भूकंप के प्रमाण , जुटे हुए खेत के प्रमाण , कपास की खेती के प्रमाण तथा कच्ची पक्की ईटो के प्रमाण मिलते है।
सबसे पहले शल्य चिकित्सा की जानकारी इसी सभ्यता से प्राप्त हुई।
कालीबंगा सभ्यता के पतन का कारण प्राकृतिक प्रकोप (भूकंप,ज्वालामुखी,बाढ़ तथा अकाल ) माना जाता है।
- आहड़ सभ्यता
आहड़ सभ्यता उदयपुर जिले में आयड़/बेडच नदी के किनारे विकसित हुई। इसकी खोज 1953 में अक्षय कीर्ति व्यास द्वारा की गई तथा इसका उत्खनन रत्नचन्द्र अग्रवाल में किया था।
यह सभ्यता 4000 वर्ष पुरानी है , यह सभ्यता एक ग्रामीण सभ्यता थी जहा भवनों का निर्माण कच्ची ईंटो से किया गया।
यहाँ उत्खनन में बस्तियों के 8स्तर मिले है, चौथे स्तर से तांबे की 2 कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है। इस सभ्यता को आघाटपुर या धुलकोट के नाम से भी पुकारते थे।
यहाँ परिकर का मुखिया पिता होता था या संयुक्त परिवार प्रथा विधमान थी। यहाँ से यूनानी देवता अपोलो (सूर्य देवता ) का चित्र प्राप्त हुआ है जिससे अनुमान लगाया जाता है की आहड़ सभ्यता का संबध यूनानी सभ्यता से था।
इस सभ्यता से जले हुए चावल के अवशेष प्राप्त हुए है। यहाँ से ताम्बे के बर्तन तथा औजार बनाने का केंद्र मिला है। इस सभ्यता को ताम्र नगरी सभ्यता भी कहा जाता है।
राजस्थान में दुर्ग प्रकार
- कौटिल्य के अनुसार दुर्गो को चार कोटियों में बांटा गया है जो की जल दुर्ग, गिरि दुर्ग, धान्वन दुर्ग तथा अरण्य या वन दुर्ग है।
- शुक्र नीतिकार ने दुर्गो के 9 भेद बताये है जो निम्न प्रकार है।
- एरण दुर्ग - खाई, काँटों तथा पथ्थरो से जिसके मार्ग दुर्गम हो जैसे रणथम्बोर का दुर्ग।
- पारिख दुर्ग- वे दुर्ग जिसके चारो ओर बहुत बड़ी खाई हो जैसे जूनागढ़ का दुर्ग।
- पारिध दुर्ग- वे दुर्ग जिसके चारो और ईंट , पत्थर तथा मिटटी से बना बड़ी बड़ी दीवारों का परकोटा हो। जैसे कुम्भलगढ़ का दुर्ग
- जल दुर्ग- वे दुर्ग जिसके चारो और जल राशि हो। जैसे गागरोन का दुर्ग , भटनेर दुर्ग तथा भैंसरोड़गढ़ दुर्ग।
- अरण्य या वन दुर्ग - वे दुर्ग जो चारो और बड़े बड़े कांटेदार वृक्षों के समूह से घिरा हुआ हो जैसे सिवाणा दुर्ग।
- धान्वन दुर्ग- वे दुर्ग जिसके चारो और दूर दूर तक मरुभूमि फैली हो। जैसे जैसलमेर दुर्ग, बीकानेर दुर्ग तथा नागौर दुर्ग।
- गिरि या पर्वत दुर्ग- किसी दुर्गम पहाड़ी पर स्थित दुर्ग जिसमे जल संचय का उचित प्रबंध हो गिरि दुर्ग की कोटि में आते है। राजस्थान के अधिकांशतः प्रमुख दुर्ग इसी कोटि में आते है।
- सहाय दुर्ग- ऐसे दुर्ग जिसमे शूरवीर तथा सैनिको के साथ साथ सदा अनुकूल रहने वाले बांधव लोग रहते है जैसे जालोर दुर्ग तथा सिवाणा दुर्ग।
- सैन्य दुर्ग- वे दुर्ग जिनमे व्यूह रचना के साथ चतुर सैनिक हो।
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