प्रमुख रोग तथा उनका उपचार
थैलीसीमिया: यह एक आनुवंशिक रोग है, इससे पीड़ित रोगी में RBC निर्माण की क्षमता नहीं होती है या अति न्यून होती है। उससे हीमोग्लोबिन का अभाव तथा अन्य अंगो को आक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो जाती है। फलस्वरूप रोगी की शारीरिक वृद्धि तथा जैविक कार्यप्रणाली अवरुद्ध हो जाती है। अस्थिमज्जा प्रत्यारोपण से रोगी को पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है।
ड्रॉप्सी (DROPSY): यह सरसो के तेल में मिलावट से होने वाली बीमारी है जिससे किडनी, यकृत, आँखे तथा हृदय आदि अंग प्रभावित होते है जो अंततः रोगी की मृत्यु का कारण भी बन जाते है सरसो के तेल में पीली कंटीली के तेल की मिलावट करने से उसमे पाया जाने वाला जहरीला रसायन सैंग्वनेरीन इस रोग का कारण बनता है। सन 2000 में इस रोग ने महामारी का रूप ले लिया था।
हीमोफीलिया: यह एक आनुवंशिक रोग है, जिसमे ग्रसित व्यक्ति के शरीर में चोट या अन्य स्थति में रुधिर का बहाव होने पर रक्त का थक्का नहीं बनता जिससे अत्यधिक रक्त बहने से रोगी की मृत्यु हो जाती है। स्त्रिया इस रोग की वाहक होती है। पुरुषो के इस रोग से ग्रस्त होने की अधिक सम्भावना होती है। इसका प्रारम्भ ब्रिटिश "महारानी विक्टोरिया" से मानने के कारण इसे "शाही रोग" भी कहा जाता है।
ट्रेकोमा: यह नेत्र की कोर्निआ में होने वाला रोग है। जिसके अंतर्गत जीवाणु संक्रमण के कारण कोर्निआ में वृद्धि हो जाती है तथा आखे सूजकर लाल हो जाती है। उनमे से निरंतर पानी निकलता रहता है और नेत्र ज्योति नष्ट होने का खतरा भी बना रहता है। इसके उपचार के लिए "पेनिसिलिन" तथा "क्लोरोमाइसिटिन" नामक औषधियों का प्रयोग करना चाहिए।
डाउन्स सिंड्रोम : यह जीनीय विकृति से उत्पन्न रोग है जिसका कारन भ्रूण निषेचन के समय 21 वे गुणसूत्र में 2 की बजाय 3 प्रतियो का सलग्न होना है , जिससे भ्रूण में गुणसूत्रों की संख्या 46 के बजाय 47 हो जाती है। अतः उत्पन्न शिशु का शारीरिक मानसिक विकास पूर्ण रूप से नहीं हो पाता। अविकसित कंकाल तंत्र, मानसिक जड़ता, चेहरा सपाट तथा गोल, रूखे एव खड़े बाल आदि इसके लक्षण है। इसे मंगोलिज्म भी कहा जाता है।
स्वाइन फ्लू: यह h1n1 नमक इन्फ्लून्जा वायरस से फैला एक संक्रामक रोग है, जिसके लक्षण जुखाम, बुखार, खांसी आदि है। कुछ समय पूर्व इसने पुरे देश में महामारी का रूप ले लिया था।
हाइड्रोफोबिआ: यह रेबीज नमक वायरस से उत्पन्न रोग, जिससे तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है। यह विषाणु कुत्ता, बिल्ली, गीदड़ आदि जानवरो के काटने से फैलता है। इसकी चरम सीमा ने रोगी पानी से डरता है और उसकी मृत्यु भी हो जाती है। इससे बचाव तथा उपचार के लिए एंटीरेबीज के टीके लगवाने चाहिए।
हेपेटाइटस: यह वायरस जनित रोग है, जिससे यकृत में खराबी आ जाने के कारण पित्त वर्णक का पूर्ण अपचय नहीं हो पाता और शरीर पीला हो जाता है। यह A तथा B दो प्रकार के विषाणुओं से फैलता है जिससे रोगी को भूख की कमी तथा खून में पित्त की वृद्धि हो जाती है।
एड्स (AIDS): यह HIV नमक वायरस से फैला संक्रामक रोग है, जो श्वेत रक्त कणो पर प्रहार करके रोगी के प्रतिरक्षा तंत्र को नष्ट कर देताहै उससे रोगी कई बीमारियों का शिकार हो जाता है। इस रोग का संक्रमण - संक्रमित रक्त चढाने से, संक्रमित इंजेक्शन का प्रयोग करने से, असुरक्षित यौन सम्बन्ध से, माता से भ्रूण को आदि कारणों से होता है। इस रोग की जाँच हेतु ALISA तथा इलाज हेतु ART नामक तकनीक विकसित की गई है।
पार्किसन रोग: यह तंत्रिका तंत्र से सम्बंधित रोग है जिससे ज्यादातर प्रौढ़ तथा वृद्ध व्यक्ति ही शिकार होते है। इस रोग के अंतर्गत व्यक्ति का अपनी पेशियों पर नियंत्रण धीरे धीरे कम हो जाता है और रोग की उच्चतम अवस्था में उसके शरीर में कंपकपी, शरीर में झुकाव, तथा धीमी चाल जैसे लक्षण प्रकट होते है। इस रोग में डोपामिन नामक प्रदार्थ की कमी हो जाती है जो स्नायु संकेतो के संचरण तथा उत्पन्न करने का कार्य करता है।
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