राजकुमार की चतुराई
सम्राट विजयसेन अपने सिंहासन पर बैठे थे। उनका मुख प्रसन्नता से चमक रहा था। सम्राट के चारो और बैठे सभी सभापद, मंत्रीगण मुक्त कंठ से प्रसंशा कर रहे थे।
बात भी कुछ ऐसी ही थी। विजयसेन ने अपने शक्तिशाली शत्रु रतनपुर के राजा को युद्ध में ऐसा खदेड़ा था की वह लड़ाई का मैदान छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
सभी सभापद राजा की इतनी तारीफ कर रहे थे की राजा का घंमड और भी बढ़ता जा रहा था।
अपनी प्रशंसा सुनकर राजा सोचने लगा, 'सचमुच मै कितना महान हू। कितनी शक्ति है मुझमे। है कोई राजा जो मुझे हरा सके ?'
तभी राजा का ध्यान राजकवि सौमित्र पर गया। वे चुपचाप बैठे थे। राजा की प्रशंसा में कोई कविता नहीं सुना रहे थे।
'राजकवि को हमारी विजय की प्रसन्नता नहीं हुई ?' राजा ने पूछा।
'ऐसा कैसे हो सकता है, महाराज! राजकवि ने हाथ जोड़कर कहा।
'तो फिर हमारी प्रशंसा में कविता क्यों नहीं सुना रहे ?' राजा ने पूछा।
'क्षमा करे महाराज ! मै केवल ईश्वर की शक्ति की प्रशंसा करता हु। उन्ही की शक्ति से आप विजयी हुए है। ' राजकवि ने नम्रतापूर्वक कहा।
यह सुनकर रखा को गुस्सा आ गया। उसने क्रोध से कहा, 'राजकवि। ईश्वर कुछ नहीं है। तुम उसकी नहीं हमारी इच्छा से नियुक्त हुए हो। या तो एक सप्ताह में हमारे लिए काव्य रचना करो या तुम्हे एक सप्ताह बाद मृत्यु दंड दिया जायेगा।
राजकवि उस समय चुप ही रहे। कुछ भी कहना राजा के गुस्से को बढ़ाना ही होता। बाद में वे मन ही मन सोचने लगे की मै आत्महत्या कर लूंगा और कुछ भी नहीं लिखूंगा। मै कवी हूँ और ईश्वर की स्तुति करता हूँ।
अतः राजकवि मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे। वे निरंतर ईश्वर की चिंता में डूबे रहते।
इस घटना के तीन दिन बाद ही महल में हाहाकार मच गया। सांप के काटने से राजा का एकलौता पुत्र मर गया। राजकवि तुरंत भागा भागा राजमहल आया। राजा सिर पीट पीट कर विलाप कर रहा था -"हे ईश्वर, ये तूने क्या किया ? इसके साथ साथ तू मेरे भी प्राण ले लेता।"
राजकवि को देखते ही राजा ने कहा - "राजकवि! ईश्वर ने मेरी आँखे खोल दी है। उसी की इच्छा से सब कुछ होता है। अब तक मै व्यर्थ के घमंड में था। इसी का दंड मुझे मिला है।
' आप ठीक कहते है पिताजी!' सहसा मरा हुआ पुत्र बोल उठा। सभी आश्चर्य से दंग रह गए। राजा ने पुत्र को हृदय से लगा लिया। उसके मुँह से बस इतना ही निकला -' हा पुत्र'
वास्तव में बात यह हुई थी की राजकवि के मृत्यु दंड की बात सुनकर उसे बचने के लिए ही राजकुमार ने यह नाटक किया था, क्योकि वह जानता था कि राजकवि कभी ऐसा ग्रन्थ नहीं रचेगा जैसा की उसे आज्ञा मिली है।
उसने सिर्फ मरने का नाटक किया और बाद में सेवक ने योजनानुसार उसके मरने की खबर उड़ा दी।
अब राजा ने राजकवि से ईश्वर की प्रस्तुति में महाकाव्य लिखने का अनुरोध किया।
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