प्रमुख साहित्यकार (ख्यात साहित्य)
ख्यात साहित्य ऐसा साहित्य है जो की राजस्थान में 16 वी शताब्दी में लिखा जाने लगा , ऐसा साहित्य जो की ख्यात को दर्शाये उसे ख्यात साहित्य कहते है। यह शब्द संस्कृत के शब्द प्रख्यात का अपभ्रंश है। अधिकांश ख्यात साहित्कार लेखक दरबारी, चारण या भाट होते थे किन्तु मुहणोत नैणसी इसके अपवाद है।
- मुहणौत नैणसी (1610-1670 ई.)
ये जोधपुर के दीवान जयमल के ज्येष्ठ पुत्र थे जो की 27 वर्ष की आयु में राज्य सेवा में नियुक्त हुए थे। दीवान बनने के बाद जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह का विश्वास जीता , अपने जीवन के अंतिम वर्षो में इन्हे कष्ट झेलने पड़े और मज़बूरी में आत्महत्या भी करनी पड़ी थी। इनकी प्रसिद्द रचनाओं में
नैणसी री ख्यात , मारवाड़ रा परगना री ख्यात प्रसिद्द है। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को '
राजस्थान का अबुल फजल ' कहा है।
- बांकीदास आशिया (1781-1833 ई.)
चरण लेखकों में बांकीदास का महत्पूर्ण स्थान है। मुनि
जिनविजय ने उसे एक महान कवी और इतिहासकार स्वीकार किया है। ये जोधपुर के राजा मानसिंह के विश्वास पात्र थे। ये डिंगल, पिंगल, संस्कृत, तथा फ़ारसी भाषाओ के अच्छे जानकर थे। गौरी शंकर हीराचंद ओझा के अनुसार
बांकीदास की ख्यात इतिहास का खजाना है।
- दयालदास सिढाचय (1798-1891 ई.)
बीकानेर के चरण जाती के दयालदास में कई विशेषताएं थी वे इतिहासकार, ख्यातकर, कवि और मारवाड़ी भाषा के उच्चकोटि के गद्य लेखक थे। बीकानेर के राजा रतनसिंह के दरबारी थे। इनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में '
बीकानेर रै राठौड़ो री ख्यात' है जिसे '
दयालदास की ख्यात' भी कहते है , इसी ख्यात में बीकानेर का क्रमबद्ध इतिहास मिलता है।
- सूर्यमल्ल मिश्रण (1815-1868 ई.)
ये बूंदी के महाराव रामसिंघ के दरबारी थे। बूंदी के महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण की सर्वाधिक प्रसिद्द रचना '
वंश भास्कर' पिंगल भाषा में रचित है। यह रचना मूलतः 4000 पृष्ठो में बूंदी के हाडा चौहानो का इतिहास है। इनकी अन्य रचनाओं में '
वीर सतसई' है जो वीर रस प्रधान कृति है। इसकी पृस्ठभूमि 1857 की क्रांति है।
- कर्नल जेम्स टॉड (1782-1835 ई.)
इनका जन्म 1782 में इंग्लैंड के लिंगटन नामक स्थान पर हुआ ये 1806 में उदयपुर पहुंचे। 1817-1822 के बीच दक्षिणी पश्चिमी राजपुताना के मेवाड़ तथा हाड़ौती क्षेत्रो में रेजिडेंट पद पर नियुक्त हुए। इन्होने मांडलगढ़ के जैनयति ज्ञानचदं को गुरु बनाया। अपनी यात्रा वृतांत
"TRAVELS IN WESTERN INDIA" इन्हे ही समर्पित किया। 1829 में इनके द्वारा रचित पुस्तक
'annals and antiquities of rajasthan' पुस्तक का संपादन
विलियम क्रुक ने किया। टॉड की दूसरी पुस्तक
"THE CENTRAL AND WESTERN RAJPUT STATES OF INDIA" 1839 में प्रकाशित हुई।
- डॉ. गोरीशंकर हीराचंद ओझा (1863-1947 ई.)
इनका जन्म 1863 में सिरोही के रोहिड़ा गांव में हुआ। इन्होने 1894 में हिंदी भाषा में भारतीय प्राचीन लिपि का शास्त्र तथा 1911 में सिरोही राज्य का इतिहास लिखा , 17 अप्रैल 1947 ई. को रोहिड़ा गांव में इनका देहांत हुआ।
- कविराजा श्यामलदास (1836-1893 ई.)
इनका जन्म भीलवाड़ा के चालीवाड़ा में 5 जुलाई 1836 को हुआ था। इन्होने "
वीर विनोद" नामक ग्रन्थ की रचना 1871 में की जो 1892 के लगभग तैयार हुई जो की पांच बड़ी जिल्दो में उपलब्ध है। इस पुस्तक में उदयपुर राज्य के इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है। 1879 में राजा सज्जनसिंह ने इन्हे कविराजा की उपाधि से सम्मानित किया तथा ब्रिटिश सरकार ने केसर ऐ हिन्द की उपाधि दी।
- दशरथ शर्मा (1903-1976 ई.)
इनका जन्म चूरू में हुआ था , 1945 में इन्होने बीकानेर में सार्दुल राजस्थानी रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना की। इनके प्रमुख ग्रन्थ में
"पृथ्वीराज चौहान तृतीय और उसका युग" तथा
"LECTURES ON RAJPUT HISTORY AND CULTURE" थी।
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