लाभदायक जंतु तथा हानिकारक जंतु:


लाभदायक जंतु तथा हानिकारक जंतु:

लाभदायक जंतु:


  • केंचुआ (Earthworm/Pheretima):
ये किसानो के मित्र है क्योकि ये खेतो की मिटटी को पलटते रहते है जिससे खेतो को मिटटी पोली हो जाती है और फसलों के पौधो की जड़ो को स्वशन हेतु वायु भली प्रकार मिलती रहती है।  इससे फसले अच्छी होती है।  अपनी उत्सर्जी नाइट्रोना प्रदार्थ खेतो में छोड़ते है जिससे उर्वरकता बढ़ जाती है।  कृषि में लाभ पहुंचने के अतिरिक्त इन्हे मछली पकड़ने के लिए चारे के रूप में उपयोग करते है।  

  • रेशम कीट: 
रेशम कीट एक शलभ होता है , इसके कोनून से रेशम प्राप्त होता है।  रेशम का कीट प्राय शहतूत के वृक्षों पर पला जाता है।  यह एक पालतू जीव है।  रेशम उत्पादन या रेशम कीट पालन को सेरीकल्चर भी कहा जाता है।  लगभग 25000 कोकून से एक पौंड रेशम मिलता है।

  • मधुमक्खी (honey bee): 
यह एक सामाजिक तथा बहुरूपिक कीट है।  यह एक कॉलोनी बनाकर रहता है।  प्रत्येक कॉलोनी की अपना एक मोम का बना छत्ता होता है।  मधु का निर्माण ये फूलो से एकत्रित रस ततः पराग से करते है।  औसत कॉलोनी में एक बड़ी रानी, लगभग 100 नपुंसक नर तथा हजारो छोटी नपुंसक श्रमिक मक्खिया होती है।  रानी का कार्य केवल अंडे देना होता है।  इनके व्यव्हार की व्यक्ख्या 1950 में वान फ्रिश ने की थी।  आया मक्खिया केवल अंडो की देखभाल करती है।  भोजन संग्रहकर्ता मक्खिया फूलो का रस तथा पराग संग्रह करती है।  सम्पाती मक्खिया दूषित हवा को बाहर करने का कार्य करती है।  सफाई मक्खिया छत्ते की सफाई करती है।  नियंत्रक मक्खिया अन्य सभी मक्खियों की क्रियाओ पर नियंत्रण करती है।  मधुमक्खी पालन को एपिकल्चर कहते है।  मधुमक्खी से हमें शहद, मोम, फूलो में परागण आदि की पूर्ति होती है।  


  • लाख का कीट (Lac Insect Laccifer):
यह कीट भारत , बर्मा आदि के जंगल में पीपल, साल, बरगद, अंजीर आदि के पेड़ो पर प्रतिकूल परिस्थितियों में शत्रुओं से बचने के लिए और अंडे देने के लिए एक दो सेमी मोटी पपड़ी के रूप में लाख का रक्षात्मक घोसला बनाता है।  मादा कीट द्वारा लाख दिया जाता है।  लाख से वार्निश, पोलिश, चमड़ा, ग्रामोफ़ोन, बिजली का सामान, खिलोने, बर्तन तथा चुडिया आदि बनाई जाती है।  


  • लाही अर्थात कोचिनियल बग (cochineal bug ):
यह गहरे लाल रंग का कीट है।  इसके सूखे शरीर को पीसकर कर एक लाल रंग बनाते है ,जिसे लाही कहते है। इस रंग से औरते 'आलता 'या 'महावर 'लगाती है। इसका उपयोग मदिरा तथा दवाओ को रंगने और कुकुर खांसी (whopping cough )आदि में होता है। फफोला गुबरैला (blister beetle lytta )-इसके रक्त से दवाई बनाई जाती है। पुष्पों के परागण करने वाले कीट (insect pollinators )भौरा ,मखिया, तितली,पतंग ,गुबरैल आदि। 
खाये जाने वाले कीट -झींगुर तथा पतंगो की कुछ जातीय मनुष्य के खाने योग्य होती है। दीप्ति कीट-फोटिनस, लेपाइरस आदि कीटो के उदरभाव पर प्रकाश उत्पन्न करने वाले अंग होते है।



हानिकारक जंतु :
A  -मानव शरीर में रोग  उत्पन्न  करने वाले जंतु -

परजीवी जंतु, रोग वाहक जंतु ,परजीवी जंतु, अन्तः परजीवी -गोलकृमि ,फीता कृमि ,हुकवर्म आदि 
बाह्य परजीवी -मछर जू ,खटमल जोक किलनी खुजली की कीलनि आदि। 
रोगवहांक जंतु -घरेलू मक्खी 
घरेलू मक्खी द्वारा हैजा ,पेचिश ,वमन पतले दस्त ,अतिसार,टाइफाइड ,आँखों में ट्रैकोमा आदि रोग फैलता है। 
एस्केरिस मनुष्य की आंत का परजीवी है। एस्केरिस का संक्रमण दूषित जल  कच्चे दूध फल साग सब्जी बिना धोये खाने से फैलता है। फीता कृमि का सक्रमण सूअर का अधपका मॉस खाने से होता है। हुकवर्म भी छोटी आंत का परजीवी है यह मनुष्य का रुधिर चुसता है। हुकवर्म का संक्रमण नंगे पैर चलते फिरते हो जाता है लारवा छेद बनाकर पैर मे घूस जाता है।

मछरों की प्रमुख जातीय है -
1 एनाफिलीज (anophelese )
2 क्यूलेक्स (culex )
3 एडीज (aedes )
मछरो से फैलने वाले रोग -मलेरिया ,पिट ,ज्वर ,फील पांव मस्तिष्क शोथ आदि है। खटमल एक अस्थाई परजीवी है , जो चारपाइयों में रहते है। खटमल रात्रिचर प्राणी  है। जूँ एक बाह्य अस्थायी परजीवी है। 
जू से फैलने वाल्व रोग -टाइफस फीवर ट्रेंच ज्वर ,त्वचा के रोग  ,रिलेप्सिंग ज्वर आदि प्रमुख है खुजली रोग को स्कबीज़ कहते है।

B. सम्पति एवं फसल को हानि पहुंचाने वाले जंतु 
टिड्डी (locust )-यह कोटी वर्ग ला प्राणी है। यह फसलों को तेजी से खाकर नष्ट कर  देती है इसकी तीन जातीय पाई जाती है। 
a )मरुस्थली टिड्डी 
b )प्रवासी टिड्डी 
C )बॉम्बे टिड्डी 
खेतो में पानी भर देने से इनके अंडे नष्ट हो जाते है। एल्ड्रीन का 25 %घोल का छिड़काव कर देने से निम्फ मर जाते है।
तोता -यह बागो के फलो को खाकर नष्ट करता  है। यह खेतो से अनाज की बलियो को काट  कर ले जाते है।

चूहा -चूहा स्तनीवर्ग का जंतु है। यह अनाज के एक बहुत बड़े भाग को खा जाते है खेत में उगी फसलों को काट कर पेड़ो को गिरा देते है यह हानिकारक रोग प्लेग के वाहक होते है।

आलू कटची /कजरा पीलू -तह मटमैला सा पतंगा होता है ,जो की रबी की फसलों को खाकर नष्ट कर  देता है। 
लाल कद्दू बीटल -यह कद्दू कुल के पौधो को खाकर नष्ट क्र देते है।

पौधों का रस चूसने वाले कीट -
कपास का झांगा -     कपास सर 
गणापन्न फुदगी /पाइरिला -  गन्ने के पेड़ पर 
गन्ने की लहि -  गन्ने के पेड़ पर 
गोभी का चेंपा -  धान की बलियो पर 
कला सुडर -   शलजम ,चुकंदर ,गाजर आदि पर 
आम का तेला   -आम की बोर नष्ट करती है 
काकरोचों ,काली चींटी ,झींगुर लाल चींटी  आदि  मनुष्य को खीजने वाले कीट है। 
ततैया तथा मधुमक्खी के डंक जहरीले होते है 
इनके डंक में फार्मीक अम्ल पाया जाता है 
रोग फैलाने वाले कीट ;कीट रोग 
1 )घरेलू मक्खी -अतिसार ,हैजा ,कोढ़ ,टाइफाइड ,टी.बी तपेदिक 
2 )मछर -मलेरिया ,फीलपांव ,दण्डक ज्वर तथा पीट ज्वर 
3 )चूहा फ्ली -प्लेग या तीन की महावारी 
4 )सी सी मक्खी -अफ्रीकन नीदरारोग 
5 )सैंडफ्लाय -कला बाजार तथा फोड़ो का रोग 
6 )खटमल -कोढ़ ,रिलेप्सिंग फीवर 
7 )शरीर की जू -टाइफस ,ट्रेंचजवेर ,रिलेप्सिंग ज्वर आदि 







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