Origin and Development of Life



जीवन की उत्पत्ति तथा विकास (Origin and Development of Life)



भूतल पर जीवन की उत्पत्ति के सवाल पर वैज्ञानिको तथा दार्शनिको के मतों में एकरूपता नहीं आ पाई है और मतांतर बना हुआ है। प्राचीन काल से ही भिन्न समय पर विभिन्न वैज्ञानिको एवं दार्शनिको ने इसके संदर्भ में अपनी अलग अलग सकल्पनाये प्रस्तुत की है। 

लेकिन अब तक प्रस्तुत की गयी सारी सकल्पनाओं में जीवन की उत्पति के संदर्भ में सबसे आधुनिक ,विस्तृत और सर्वमान्य परिकल्पना रुसी जीवन -रसायनशास्त्री ए आई ओपेरिन (a i oparin ) ने सन 1924 में अपनी पुस्तक में 'the origing of life 'में इसकी विस्तृत व्याख्या की। इस परिल्पना के अनुसार -

(क ) 'जीवन की उत्पति 'अचानक रासायनिक उद्विकास के फलस्वरूप हुई। सर्वप्रथम पृथ्वी का उदभव अंतरिक्ष के एक ज्वलनशील एवं घूणशील गैसीय पिण्ड से हुआ। उन्होने विश्वास व्यक्त किया की पृथ्वी के प्रारम्भिक वातावरण में (ताप 3000 -6000 डिग्री c )गैसीय अवस्था में बहुत सारे तत्वों के अलावा उन सारे रासायनिक तत्वों (हाइड्रोजन ,कार्बन ,नाइट्रोजन ,गंधक ,सूक्ष्म मात्रा में ऑक्सीजन ,फास्फोरस इत्यादि )के स्वतंत्र परमाणु थे, जीवद्रव्य का प्रमुख संघटक होता है।  क्रमश ;पृथ्वी ठंडी होती गयी और इन्हे स्वतंत्र परमाणुओं ने पारस्परिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप तत्वों के साथ साथ सरल  अकार्बनिक यौगिकों का निर्माण किया।  आदिवायुमण्डल वर्तमान उपचायक या उकसिकारक वायुमंडल के वितरित उपचायक था ,क्योकि इसमें हाइड्रोजन ने ऑक्सीजन के सारे परमाणुओं से मिलकर जल  (h 2 o )बना लिया।  अत :ऑक्सीजन (o 2 ) के स्वतंत्र परमाणु आदि वायुमंडल में नहीं रहे। अत :सारा जल वाष्प के रूप में वायुमंडल में रहा। नाइट्रोजन के परमाणुओ ने अमोनिया (n h 3 )भी बनाई।

(ख )ताप के और कम होने पर अणुओ के पारस्परिक आकर्षण एवं प्रतिक्रिया के फलस्वरूप कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ। जैसे एमिनो एसिड ,वसीय अम्ल ,प्यूरिन्स ,मीथेन और शुगर आदि।  इन इन सभी रासायनिक प्रतिक्रियाओ के लिए ऊर्जा कास्मिक किरणों और अल्ट्रावायलट किरणों से प्राप्त हुई।  इन्ही सब कार्बनिक यौगिकों के निर्माण में इन्ही घटको की आवश्यकता है।  
एक अमरीकी वैज्ञानिक स्टैनले मिलेर ने ओपेरिन की परिकल्पना की ऊर्जा की उपस्थिति में ,मीथेन ,हाइड्रोजन ,जलवाष्प एवं अमोनिया के सयोजन से एमिनो अम्लो ,सरल शर्कराओं तथा अन्य कार्बनिक यौगिकों के निर्माण की सम्भावना को 1955 ई में सिद्ध कर दिखाया। उन्होने एक विशेष वतावरण में अमोनिया ,मीथेन ,हाइड्रोजन एवं जलवाष्प के गैसीय मिश्रण में विद्युतधारा प्रवाहित की।  इस प्रकार के फलस्वरूप यह निष्कर्ष निकला की यह एमिनो अमल ,सरल शर्कराओं ,कार्बनिक अम्लों अन्य यौगिकों का मिश्रण था।  

(ग ) ओपेरिन के अनुसार, कार्बनिक यौगिकों की इकाइयों ने पारस्परिक संयोजन से जटिल कार्बनिक यौगिकों के बहुलक बनाये। इस प्रकार शर्कराओं के अणुओ से वसाओं का निर्माण हुआ।  इनमे प्रोटीन्स तथा न्यूक्लिक अम्लों की प्रतिक्रिया से न्यूक्लिओ प्रोटीन्स बनी।  जिसमे स्व द्विगुणन की क्षमता थी।  न्यूक्लिओ प्रोटीन्स के कानो के बनने के बाद झिल्लीयुक्त कोशरुपी आदिजीव का निर्माण हुआ।  आदिजीव (आदिकोशिकाये) आजकल के नीले-हरे शैवालों जैसी थी।  इनके द्वारा प्रकाश संश्लेषण क्रिया से वायु मंडल में स्वतंत्र आक्सीजन मुक्त हुई।  आक्सीजन ने आदि व्वायुमण्डल की मीथेन तथा अमोनिया को कार्बन डाई आक्साइड , नाइट्रोजन और जल में विघटित किया।  अतः वायुमंडल का संयोजन वही हो गया जो आजकल है वायुमंडल में उपस्थित है।  सभी ऑक्सीजन का उत्पादन प्रकाश संश्लेषण करने वाले जीव ही करते है और ऑक्सीजन ने पुरे वातावरण को अपचायक से ऑक्सीकारक बना दिया इन महत्पूर्ण परिवर्तनों के कारन इसे ऑक्सीजन क्रांति खा जाता है, इस प्रकार जीवन का उदभव जटिल रासायनिक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ , इसलिए यह परिकल्पना जीवन का रासायनिक सश्लेषण सिद्धांत के रूप में भी जानी  जाती है। 
   

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