गुलाम वंश की स्थापना 1206 ईस्वी में कुतुबुदीन ऐबक ने की थी। वह गौरी का गुलाम था।
ऐबक ने अपनी राजधानी लाहौर में बनाई थी। कुतुबमीनार की नींव ऐबक ने डाली थी। इसने अपने नाम से कोई सिक्का जारी नहीं किया।
दिल्ली का कुवत-उल-इस्लाम मस्जिद तथा अजमेर में स्थित ढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद का निर्माण ऐबक ने करवाया।
ऐबक को लाखबक्श भी कहा जाता था क्योकि वह लाखो का दान देने वाला कहा जाता था।
प्राचीन नालंदा विश्व विद्यालय को ध्वस्त करने वाला ऐबक का सहायक सेनानायक बख्तियार खिलजी था।
ऐबक की मृत्यु 1210 ईस्वी में चौगान खेलते हुए घोड़े से गिरकर हो गई। इसे लाहौर में दफनाया गया था।
ऐबक का उत्तराधिकारी आरामशाह था जिसने सिर्फ 8 माह तक शासन किया।
आरामशाह की हत्या करके इल्तुतमिश 1211 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बैठा।
इल्तुतमिश तुर्किस्तान का इल्बारी तुर्क था जो ऐबक का गुलाम तथा दामाद था , ऐबक की मृत्यु के समय वह बदायू का गवर्नर था।
इल्तुतमिश लाहौर से दिल्ली राजधानी लाया था।
यह पहला ऐसा शासक था जिसने 1229 ईस्वी में बगदाद के खलीफा से सुल्तान की वैधानिक स्वीकृति प्राप्त की।
इल्तुतमिश की मृत्यु 1236 ईस्वी में हो गई थी।
इसके बाद उसका पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज गद्दी पर बैठा पर अल्पकालीन शासन पर उसकी माँ शाह तुरकन छाई रही।
शाह तुरकन के अवांछित प्रभाव से परेशान होकर तुर्की अमीरो ने रजिया को सिंहासन पर आसीन किया। इस प्रकार रजिया बेगम प्रथम मुस्लिम महिला थी जिसने बागडोर की शासन संभाली।
रजिया ने पर्दा प्रथा का त्यागकर तथा पुरुषो की तरह चोगा तथा कुलाह पहनकर राजदरबार ने खुले मुँह से जाने लगी।
गैर तुर्को को सामंत बनाने के कारण रजिया को बंदी बनाकर बहरामशाह को गद्दी पर बैठा दिया गया।
रजिया की शादी अल्तुनिया से हुई। इससे शादी करने के बाद रजिया ने पुनः गद्दी प्राप्त करने का प्रयास किया परन्तु वह असफल रही।
रजिया की हत्या 13 अक्टूबर 140 ईस्वी को डाकुओ के द्वारा बेथल के पास कर दी गई।
नसीरुद्दीन महमूद ऐसा सुल्तान था जो की टोपी सीकर अपना जीवन निर्वाह करता था।
बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नसीरुद्दीन महमूद के साथ किया था।
बलबन का वास्तविक नाम बहाउदीन था तथा वह इल्तुतमिश का गुलाम था।
तुर्कान-ए-चिहलगानी का विनाश बलबन ने किया।
बलबन 1266 ईस्वी में दिल्ली की गद्दी पर बैठा। यह मंगोली आक्रमण से दिल्ली की रक्षा करने में सफल रहा।
राजदरबार में सिजदा तथा पैबोस प्रथा की शुरुवात बलबन ने की।
बलबन ने फ़ारसी रीति रिवाज पर आधारित नवरोज उत्सव का प्रारम्भ करवाया।
अपने विरोधियो के प्रति बलबन ने लोह एव रक्त की नीति अपनाई।
नसीरुद्दीन महमूद ने बलबन को उलुग खा की उपाधि प्रदान की।
बलबन के दरबार में फ़ारसी के प्रसिद्द कवी अमीर खुसरो तथा अमीर हसन रहते थे।
गुलन वंश का अंतिम शासक कैमुर्स था।
अमीर खुसरो का मूल नाम मुहम्मद हसन था। उसका जन्म पटियाली में 1253 ईस्वी में हुआ था। खुसरो प्रसिद्द संत औलिया के शिष्य थे। वह बलबन से लेकर मुहम्मद तुगलक तक दिल्ली सुल्तानों के दरबार में रहे। इन्हे तूती-ए-हिन्द (भारत का तोता ) के नाम से भी जाना जाता है। सितार और तबले के अविष्कार का श्रेय अमीर खुसरो को ही दिया जाता है।
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