अमरफल
किसी राज्य में राजा प्रताप सिंह का राज्य था। राजा बड़ा दानी था। उसके दरवाजे पर जो भी आता, वह खाली हाथ नहीं जाता था। उसकी दानवीरता की चर्चा दूर दूर तक फैली थी।एक दिन उसके दरबार में एक बूढ़ा किसान आया। राजा ने आदर सहित बैठाया और पूछा-" किसान महोदय! कहिये कैसे आना हुआ ?" किसान बोला, "महाराज! मै बहुत गरीब हूँ। दाने दाने के लिए मोहताज हूँ। अगर आप मुझ पर दया करे तो मेरा कल्याण हो जायेगा। "
"निः संकोच कहे आपको क्या चाहिए? निराश नहीं किया जायेगा। " राजा ने कहा।
किसान ने सहमते हुए कहा-" महाराज, कही ऐसा न हो कि आप अपने वादे से मुकर जाये? अगर आप मांगी हुई चीज देने का वचन दे तो मै मांगू."
राजा ने कुछ पल सोचा कि यह गरीब किसान मांगेगा ही क्या ? अधिक से अधिक कुछ स्वर्ण मुद्राये, मकान या जमीन का टुकड़ा। इसलिए राजा ने कहा, "जो चाहो मानगो, तुम्हे निराश नहीं किया जायेगा। हम इस बात का वचन देते है। "
राजा की बात सुनकर किसान के चेहरे पर कुटिल मुस्कान फ़ैल गई। वह बोला- "महाराज, आप मुझे अपने राज पाट का स्वामी बना दीजिये" किसान की बात सुनकर राजा सन्न रह गया। उसे किसान से ऐसी आशा नहीं थी। राजा वचन से बंधा था, मुकरता कैसे ? लिहाजा उसने सबके सामने किसान को राज पाट का स्वामी बना दिया और स्वयं वह से चला गया।
सभी चकित रह गए। वे सब राजा की दानवीरता से परिचित थे और समझ गए थे की राजा के साथ छल हुआ है। राजा प्रताप सिंह चलते चलते वन में आ गए। थक कर सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गए। उन्हें भूख भी लगने लगी थी। चारो तरफ नजर दौड़ाई परन्तु कुछ भी खाने को नहीं मिला। तभी उन्हें एक आवाज सुनाई दी , "प्रताप सिंह, भूख से व्याकुल हो न ?"
आवाज सुनकर राजा ने इधर उधर नजर दौड़ाई, लेकिन वह कोई भी नहीं था। कुछ देर बाद वही आवाज पुनः सुनाई दी, "इधर उधर क्या देख रहे हो राजन ? मै मनुष्य नहीं वृक्ष हूँ। लो यह फल खा लो, इसे अमरफल कहते है। इससे तुम्हारी भूख तो शांत होगी ही साथ ही शरीर भी बलशाली होगा।"
तभी एक अमरफल राजा के सामने आकर गिरा। उसने फल उठा लिया। उसे जोर की भूख लगी थी , मगर उसने सोचा की यह अमरफल किसान को दे दिया जाये तो वह बलशाली और राज्य चलने में सक्षम और अधिक हो जायेगा। यही सोचकर वह किसान राजा के पास पंहुचा और बोला- "महाराज यह अमरफल है , इसे खाकर आप और अधिक बलशाली हो जायेंगे। राज्य की रक्षा के लिए राजा का बलशाली होना जरुरी है। "
किसान राजा ने प्रताप सिंह से वह अमरफल ले लिया, परन्तु उसकी बुद्धि में एक ख्याल आया की निश्चय ही इसमें प्रताप सिंह की कोई चाल है वह यह फल खिलाकर मुझे मारना चाहता है, इसलिए उसने वह फल सेनापति को दे दिया सेनापति को प्रताप सिंह के ऊपर पूरा भरोसा था अतः उसने बिना सोचे वह फल खाना शुरू किया।
किसान राजा सोच रहा था की सेनापति फल खाकर मर जायेगा, लेकिन वहा दूसरा चमत्कार हुआ। फल कहते ही सेनापति के चेहरे पर ओज तथा युवाओ वाला पराक्रम नजर आने लगा। यह देख किसान राजा हैरत में पड़ गया। अब उसे पछतावा हो रहा था।
किसान राजा अमरफल पाने को बेताब हो गया। उसने प्रताप सिंह से पूछा की तुम यह फल कहा से लाये हो। प्रताप सिंह ने बतलाया की उसे यह फल एक वृक्ष ने दिया था। किसान राजा ने कहा-" मुझे भी एक अमरफल चाहिए। "
महाराज, उसी पेड़ से एक और अमरफल मांगते है। शायद वह एक अमरफल और दे दे। प्रताप सिंह और किसान राजा उसी वृक्ष के पास पहुंचे। वृक्ष पर बहुत से अमरफल देख किसान खुश हो गया। प्रताप सिंह ने वृक्ष से कहा, "वृक्ष देवता, एक अमरफल महाराज को भी दे दो। "
"नहीं, मै इसको अमरफल नहीं दूंगा। यह धोखेबाज तथा धूर्त है। " वृक्ष ने क्रोध भरी आवाज में कहा।
किसान राजा पहले तो वृक्ष की बात सुनकर सकपकाया, मगर फिर क्रोध से भर उठा। आखिर अब वह राजा था, इसलिए वह जबरन फल तोड़ने के लिए वृक्ष की और बढ़ा मगर यह क्या ? किसान राजा जैसे ही वृक्ष की और बढ़ा वृक्ष चरमराकर उसके ऊपर गिर पड़ा। वृक्ष से दबकर किसान राजा की मृत्यु हो गई।
प्रताप सिंह यह देख कर हक्का बक्का हो गया तभी वृक्ष से एक महात्मा अवतरित हुए। प्रताप सिंह ने महात्मा का अभिवादन किया। महात्मा ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, "प्रताप सिंह घबराओ मत। मै भी एक स्वार्थी और धोखेबाज आदमी था और अपने धर्म कर्म को भूल गया था। तब एक ऋषि के शाप से मै वृक्ष बन गया। उन्होंने कहा की तुम्हे शाप से मुक्ति तभी मिलेगी जब तुम अपने जैसे धोखेबाज व्यक्ति का नाश करोगे। आज मुझे शाप से मुक्ति मिल गई है। प्रताप सिंह, अब तुम अपना राज्य सम्भालो। "
यह कहकर वह महात्मा अदृश्य हो गए और प्रताप सिंह अपने राज्य की और चल दिए।
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