सिंधु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 से 1750 ईसा पूर्व मानी गई है। यह भारत की प्रथम सभ्यता है। सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की।
सिंधु सभ्यता को प्रागैतिहासिक (protohistoric) या कांस्य युग में रखा जा सकता है , इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ या भूमध्यसागरीय थे।
सिंधु सभ्यता या सेंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी इसमें प्राप्त नगरों में केवल 6 को ही बड़ो नगरों की संज्ञा दी जा सकती है। जो की निम्न है - मोहनजोदड़ो, हड्डपा, गणवारीवाला, धौलावीरा, राखीगढ़ी तथा कालीबंगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात् हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गए है।
लोथल तथा सुरकोतड़ा - सिंधु सभ्यता के प्रमुख बंदरगाह थे।
जूते हुए खेत तथा नक्काशीदार ईंटो का प्रयोग का वर्णन कालीबंगन से हुआ है।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त अन्नागार संभवत सेंधव सभ्यता का सबसे बड़ी ईमारत मानी गई है।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्नानागार एक प्रमुख ईमारत है जिसके मध्य एक स्नानकुंड है। अग्निकुंड लोथल तथा कालीबंगा से प्राप्त हुए है।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले पशुपति नाथ देवता की मूर्ति मिली है। उनके चारो और हांथी, गेंडा, चीता और भैंसा विराजमान है।
मोहनजोदडो से नर्तकी की कांस्य मूर्ति प्राप्त हुई है। मनके बनाने के कारखाने लोथल और चन्हूदड़ो में मिले है। सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है। यह लिपि दाये और से बाए और लिखी जाती है।
सिंधु सभ्यता के लोगो ने अपने घरो तथा नगर हेतु ग्रिड पद्धति अपनाई। घरो के दरवाजे और खिड़किया सड़क की और न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलती थी। केवल लोथल नगर के घरो के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।
सिंधु सभ्यता में मुख्य फसल गेहू और जौ थी। सेंधव वासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे।
रंगपुर तथा लोथल से चावल के दाने मिले है जिनसे धान की खेती का प्रमाण मिलता है। चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल से ही मिलता है।
सुरकोटदा, कालीबंगन तथा लोथल से सैंधवकालीन घोड़े के अस्थिपंजर मिले है। सेंधव सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों तथा चार पहियों वाली बैलगाड़ी का करते थे।
आलमगीर हड़प्पा सभ्यता सर्वाधिक पूर्वी स्थल तथा सेंधव सभ्यता का अंतिम अवस्था का सूचक है।
मेसोपोटामिया सभ्यता में वर्णित मेलुहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है।
सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा करते थे। पूजा तथा वृक्ष पूजा के भी साक्ष्य मिले है।
सिंधु घाटी के नगरों में मंदिरो के अवशेष नहीं हुए है।
सिंधु सभ्यता में मातृ देवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी , पशुओ में कूबड़ वाला सांड इस सभ्यता के लोगो के लिए विशेष पूजनीय था।
मिटटी की मुर्तिया अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि यह समाज मातृ सत्तात्मक था।
सेंधव वासी सूती तथा उनी वस्त्रो का प्रयोग करते थे।
मनोरंजन के लिए संधान वासी मछली पकड़ना, शिकार करना, चौपड़, और पांसा खेलना आदि साधनाओ का प्रयोग करते थे।
सिंधु सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन लाल मिटटी के बर्तन प्रयोग करते थे।
सिंधु घाटी के लोग तलवार के प्रयोग से परिचित नहीं थे।
कालीबंगा एक मात्र स्थल था जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था।
पर्दा प्रथा तथा वेश्यावृति सेंधव सभ्यता में प्रचलित थी। हड़प्पा में शवों को दफ़नाने की तथा मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विधमान थी।
सेंधव सभ्यता के विनाश का प्रमुख कारण बाढ़ था। आग में पकी हुई मिटटी को टेराकोटा कहा जाता था।
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