पाठको! हिंदी कहानी के लेखो को सराहने के लिए धन्यवाद। इसी क्रम में आपके लिए हिंदी कहानी - प्रेम से पासा पलटा प्रस्तुत है। उम्मीद है यह कहानी भी आपको पसंद आएगी। धन्यवाद
हिंदी कहानी - प्रेम से पासा पलटा
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| प्रेम से पासा पलटा |
एक छोटा सा राज्य था खंडेला। यहाँ का शासक महिपाल था। सज्जनता के कारण दूर दूर तक उसकी ख्याति थी। मनुष्य हो या पशु सभी के प्रति उसके मन में अगाध प्रेम था। इन गुणों के वह एक बहादुर शासक भी था।
खंडेला के पास एक और स्थान भी था जिसका नाम था मनोहरपुरा। इसका शासक शिवसिंह स्वभाव से ईर्ष्यालु प्रकृति का था। महिपाल की प्रसिद्धि से वह मन ही मन दुखी रहता था।
शिव सिंह ने बहुत कोशिश की वह महिपाल को मुग़ल बादशाह के सामने नीचा दिखाए परन्तु उसे एक भी मौका नहीं मिल पा रहा था। संयोग से शिव सिंह को एक अवसर प्राप्त हो गया। वह निश्चित मान बैठा था कि इस बार महिपाल को मुग़ल बादशाह के सम्मुख नीचा देखना ही पड़ेगा।
मुग़ल बादशाह जंगल से एक खूंखार शेर को जीवित दशा में पकड़ लाये। शेर सचमुच में असाधारण था। दरबारियों और मुग़ल बादशाह ने भी इस प्रकार का शेर पहले कभी नहीं देखा था। बादशाह ने शेर के बंद पिंजरे को अपने महल के प्रांगण में रख दिया। दिन भर उसे देखने वालो का तांता लगा रहा। शाम को मुग़ल बादशाह अपने दरबारियों तथा शिव सिंह और महिपाल के साथ उस पिंजरे के पास आये। मुग़ल बादशाह ने विनोदी स्वभाव में अपने दरबारियों से कहा - "है कोई यहाँ उपस्थित जो इस शेर के साथ मलयुद्ध कर सके ?'
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बादशाह के प्रश्न ने सबके चेहरे पर ख़ामोशी पोत दी। शिव सिंह इसी मौके की ताड़ में था वह तुरंत बोला- "हुजुर, अपने दरबार में तो केवल महिपाल जी ही है जो शेरो को मात दे सकते है। "
शिव सिंह का यह सुझाव बादशाह को अच्छा नहीं लगा, फिर भी बादशाह ने महिपाल की और मौन मुद्रा से देखा। महिपाल शिव सिंह के स्वभाव से परिचित था, अतः उसने बादशाह की प्रश्न भरी मुद्रा को सम्मान देते हुए कहा- "आपका आदेश चाहिए हुजूर। "
शिव सिंह मन ही मन प्रसन्न था। शीघ्र ही मलयुद्ध का दिन निश्चित हुआ। सारे नगर में यह समाचार बिजली की तरह फ़ैल गया। महल के जिस चौक में मलयुद्ध होना था, उसके चारो तरफ लोहे की जालिया लगा दी गई। चारो और बंदूक लिए सिपाही भी तैनात करने का आदेश हुआ।
निश्चित दिन महल के विशाल चौक में अपर जनसमूह एकत्रित हो गया। शेर का बंद पिंजरा लाया गया। कुछ क्षण बाद महिपाल महल के बीच उपस्थित हुआ तो सबकी निगाहो में उसके लिए सहानुभूति थी, किन्तु महिपाल का चेहरा सदैव की तरह प्रसन्नता से खिला हुआ था। उनके हाथ में पुष्पहार और चन्दन भरी एक कटोरी थी।
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सभी तैयारी पूर्ण होने पर शेर का पिंजरा भी महल चौक में लाया गया महिपाल अपने स्थान से उठा और पिंजरे की और बढ़ा परन्तु इस स्थिति पर शिव सिंह बहुत ही प्रसन्न था। बहुत दिन की मुराद पूरी होने जा रही थी।
द्धार खोलने का आदेश दिया गया। शेर अपनी मस्त छलांग के साथ बाहर आया और जोर से दहाड़ा।
महल की दीवार गूंज उठी वही महिपाल पूर्ण आत्मविश्वास के साथ शेर की और बढ़ा। शेर ने अपनी गर्दन उठाकर महिपाल की और झाँका और काफी देर तक देखा और थोड़ी देर बाद अपने स्थान पर स्थिर होकर बैठ गया। महिपाल बिना किसी डर के शेर के पास गया और उसके गले में माला डाल दी और साथ ही बहुत ही स्नेह के साथ उसने चन्दन से भरी कटोरी में से शेर को टीका लगा दिया। वातावरण में अपार प्रसन्नता छा गई। बादशाह सहित सभी आश्चर्यचकित थे।
तिलक लगाने के सम्मान में शेर ने भी अपनी पूंछ को हिलाकर महिपाल के प्रति आभार प्रकट किया। और शेर एक पालतू पशु की तरह वही बैठा रहा। बादशाह से रहा नहीं गया और उसने महिपाल से पिंजरे से बाहर आने का संकेत किया। महिपाल ने भाव विभोर होकर शेर सहित सबको अभिवादन किया और बाहशाह की और बढ़ा। बादशाह ने उठकर महिपाल को गले लगाया और कहा-"तुमने ये कैसे किया ?"
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महिपाल ने आभार मुद्रा में निवेदन किया -"हुजूर मैंने कुछ नहीं किया, यह तो ईश्वर की कृपा है। भविष्य में आपसे एक विनती है कि आप किसी को इस प्रकार के संकट में न डाले। बादशाह सलामत जब मै शेर की और बढ़ा तो उसने कोई हरकत नहीं की और मुझे ऐसा लगा की इसके आँखों में मेरे लिए प्यार है और यह किसी हिंसा को करना नहीं चाहता। ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा था परन्तु बिलकुल नजदीक पहुंच कर मुझे ऐसा विश्वास भी हो गया और इसीलिए मैंने माला और चन्दन का तिलक शेर को लगा दिया। "
महिपाल ने पुनः कहा - "महाराज , प्रेम तो सबमे होता है और फिर यही आपके मन में प्रेम है तो सामने वाले में प्रेम उमड़ सकता है। चाहे वह जानवर ही क्यों न हो ? बस, मुझसे जो कुछ हुआ इसी प्रेम की बदौलत हुआ है। "
बादशाह से महिपाल को गले लगा लिया और कहा-" महिपाल जी, आप धन्य है। " सभी दरबारियों ने महिपाल जी की जय के जयकारे लगाने शुरू कर दिए। दूसरी तरफ शिव सिंह शर्म के मारे अंदर ही अंदर दबा जा रहा था।
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