खिलजी वंश का इतिहास




खिलजी वंश का इतिहास 


  • दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत खिलजी वंश का स्थान महत्वपूर्व है गुलाम वंश के बाद खिलजी वंश दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाला दूसरा वंश था।  
खिलजी वंश
खिलजी वंश

  • गुलाम वंश के शासन को समाप्त कर जलालुद्दीन खिलजी ने खिलजी वंश की स्थापना की। इसने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया।  
  • 1296 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी खिलजी वंश का सुल्तान बना।  
  • अलाउद्दीन खिलजी ने सेना को नगद वेतन देने तथा स्थायी सेना की नींव रखी। दिल्ली के शासको में अलाउद्दीन खिलजी के पास सबसे विशाल स्थायी सेना थी। 



  • घोडा दागने तथा सैनिको का हुलिया लिखने की प्रथा की शुरुवात अलाउद्दीन खिलजी ने की। 
  • 1302 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने राणा रतन सिंह के समय चित्तौड़ पर आक्रमण किया। अलाउद्दीन खिलजी के कल में ही चित्तोड़ में प्रथम साका हुआ था।  अलाउदीन ने ही चित्तोड़ को जीत कर उसका नाम खिज्राबाद रखा।  
  • इसने लूट के धन में सुल्तान का हिस्सा एक चौथाई के स्थान पर तीन चौथाई कर दिया।  
  • इसने बाजार व्यवस्था को सही रखने के लिए कम तोलने वाले व्यक्ति के शरीर से मांस काट लेने का आदेश दिया।  इसने अपने शासनकाल में मूल्य नियंत्रण प्रणाली को लागु लिया।  दक्षिण भारत की विजय के लिए अलाउद्दीन खिलजी ने मलिक काफूर को भेजा।  अलाइ दरवाजा, सीरी का किला तथा हजार खम्भा का निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने करवाया।  दैवी अधिकार के सिद्धांत को अलाउद्दीन ने चलाया था। अलाउद्दीन खिलजी ने सैनिको की बेहतर नियंत्रण व्यवस्था तथा बाजार को एक नया रूप प्रदान किया।  
  • "सिकंदर-ए-सानी " की उपाधि से स्वम को अलाउद्दीन खिलजी ने विभूषित किया।  अलाउद्दीन ने मलिक याकूब को दीवान-ए -रियासत नियुक्त किया था।  

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  • अलाउद्दीन खिलजी की आर्थिक नीति की व्यापक जानकारी बरनी की कृति तारीखे फिरोजशाही में मिलती है। राजस्व सुधारो के अंतर्गत सर्वप्रथम अलाउद्दीन ने मिल्क, इनाम तथा वक्फ के अंतर्गत दी गयी भूमि को खालसा भूमि में बदल दिया।  अलाउद्दीन के द्वारा लगाए गए दो कर चराई कर तथा गढ़ी कर थे।  
  • कुतुबद्दीन मुबारक खिलजी 1316 ईस्वी को दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।  यह कभी कभी राजदरबार में स्त्रियों का वस्त्र पहनकर आ जाता था।  
  • बरनी के अनुसार मुबारक कभी कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था।  
  • मुबारक खा ने खलीफा की उपाधि धारण की थी।
  • मुबारक के वजीर खुशरो खा ने 15 अप्रैल 1320 ईस्वी को इसकी हत्या कर दी और स्वयं दिल्ली के सिंहासन पर बैठा।  
  • खुशरो खा ने पैगम्बर के सेनापति की उपाधि धारण की।  

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