महाराणा कुम्भा (कुम्भकर्ण ) : एक सम्पूर्ण परिचय




महाराणा कुम्भा (कुम्भकर्ण ) : एक सम्पूर्ण परिचय 


महाराणा कुम्भा (कुम्भकर्ण) का परिचय
महाराणा कुम्भा (कुम्भकर्ण) का परिचय 

  • महाराणा कुम्भा का जन्म परिचय - राणा कुम्भा जिन्हे कुम्भकर्ण या कंहू राणा कुम्भा के नाम से भी जाना जाता है, इनका जन्म चित्तोड़ के राजा महाराणा मोकल के यहाँ हुआ था। इनकी माता का नाम रानी सौभाग्य देवी था। जब इनकी आयु 10 वर्ष थी तो इनके पिता का निधन (1431 ईस्वी) में हो गया था अतः 10 वर्ष की अल्पायु में 1433 ईस्वी में ये मेवाड़ के शासक बने। 

  • महाराणा कुम्भा के युद्ध और संघर्ष  - इनके द्वारा सर्वप्रथम देवड़ा चौहानो को हराकर आबू पर कब्ज़ा किया गया।  उसके बाद राणा कुम्भा ने 1437 ईस्वी में सारंगपुर के युद्ध में मालवा (मांडू) के सुल्तान महमूद खिलजी को पराजित किया तथा उसे बंदी बना लिया।  
  • मालवा की वजय के उपलक्ष में कुम्भा ने अपने आराध्य देव विष्णु को नामित कीर्ति स्तम्भ या विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया। कीर्ति स्तम्भ या विजय स्तम्भ को विश्व का मूर्तिकोष कहा जाता है, इसे विष्णुध्वज भी कहा जाता है।  राणा के विजय अभियान में 1455 ईस्वी की नागौर की लड़ाई को सबसे प्रमुख माना जाता है , इस युद्ध में उन्होंने वहा के राजा मुजाहिद खा को पराजित कर शम्स खा को वहा का राजा बना दिया परन्तु शम्स खा ने राणा कुम्भा के साथ गद्दारी की जिसके कारण कुम्भा ने दुबारा नागौर पर चढ़ाई की और इसका परिणाम यह था की शम्स खा को अपनी जान बचाकर गुजरात के राजा कुतुबुद्दीन के पास जाना पड़ा। मेवाड़ और गुजरात के संघर्ष का प्रमुख कारण नागौर की राजनीतिक स्थिति थी। 
  • गागरोण का शासक अचलदास खींची कुम्भा का बहनोई था जो मोकल के शासनकाल में मांडू के सुल्तान होरंगशाह से लड़ता वीरगति को प्राप्त हुआ था।  
  • मेवाड़-मारवाड़ मैत्री- कुम्भा ने चूड़ा को भेजकर मारवाड़ पर कब्ज़ा कर लिया। किन्तु हंसाबाई के प्रयास से इन दोनों के मध्य मैत्री सम्बन्ध स्थापित हो गए और जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल से कर दिया।  



  • कला तथा संस्कृति - कुम्भा के समय धरणकशाह ने रणकपुर मन्दिर का निर्माण करवाया था जिसका शिल्पी देपाक था और तिथिक्रम के अनुसार कुम्भा द्वारा निर्मित मंदिरो में सबसे प्राचीन है। कविराजा श्यामलदास के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गो में से 32 दुर्गो का निर्माण कुम्भा ने करवाया था जिनमे कुम्भलगढ़ दुर्ग, बसंतीगढ़ दुर्ग, मचाल दुर्ग, अचलगढ़ दुर्ग (पुनर्निर्माण) प्रमुख है। ये दुर्ग गुप्तकालीन स्थापत्य से प्रभावित थे। 




  • ग्रन्थ लेखन सामग्री - कुम्भा द्वारा रचित प्रसिद्द संगीत ग्रन्थ संगीतराज, संगीत मीमांसा तथा सूंड प्रबंध थे। कुम्भा ने चंडीशतक की व्याख्या, गीतगोविन्द की टीका रसिक प्रिया और संगीत रत्नाकर की टीका भी लिखी थी।  मंडान नामक विख्यात शिल्पी ने देवमूर्ति प्रकरण, प्रसाद मंडन, राजवल्लभ रूप मंडन, वस्तु मंडन तथा वास्तु शास्त्र आदि ग्रंथो की रचना की।  मंडन के भाई नाथा ने वास्तु मंजरी और मंडन के पुत्र गोविन्द उद्धार कलानिधि द्वारा दीपिका नामक ग्रन्थ की रचना की।  कीर्ति प्रशस्ति की रचना कवि अत्रि और महेश ने की जिसमे कुम्भा की सांस्कृतिक उपलब्धियों और ग्रंथो का उल्लेख किया गया है।  एकलिंग महात्य नामक ग्रन्थ की रचना कान्ह व्यास ने की थी। 




महाराणा कुम्भा की उपाधिया
  • हिन्दू सुरताण - समकालीन मुस्लिम शासको द्वारा प्रदत्त उपाधि। 
  • अभिनव भरताचार्य - संगीत क्षेत्र में विपुल ज्ञानी होने के कारण।  
  • राणो रासो - विद्वानो का आश्रय दाता होने के कारण।  
  • हालगुरु - गिरि दुर्गो का स्वामी। 
  • छापगुरु - छापामार युद्ध पद्धति में पारंगत होने के कारण। 
  • राजगुरु - राजनीति में दक्ष होने के कारण।  

महाराणा कुम्भा की मृत्यु - 35 वर्ष की अल्पायु में कई युद्ध विजय राणा कुम्भा ने प्राप्त की तथा राजस्थान के ऐसे शासक बन गए जिन्हे हराना बहुत मुश्किल था, कुम्भा का पुत्र उदा मेवाड़ की बागडोर अपने हाथो में चाहता था परन्तु राणा कुम्भा महान शासक थे और साथ ही युद्ध कौशल भी। अतः किसी के लिए उन्हें हराना मुश्किल था परन्तु उदा ने शिव मंदिर में अपने पिता राणा कुम्भा की छुपकर तलवार से हत्या कर दी।  







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