विचित्र पुष्प वृक्ष
सुमेरगढ़ के राजा, सुमेर सिंह गर्मी से बेहद परेशान थे। रहत पाने के लिए वे अपने कुछ मंत्रियो के साथ राजमहल के विशाल बगीचे में पहुंचे। जहा की ठंडी हवाओ ने उनका मन मोह लिया। वे धीरे धीरे पैदल ही आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे उनके मंत्रीगण।तभी राजा की निगाह एक सुन्दर पुष्प-वृक्ष पर गई। उसकी सुन्दरता से आकर्षित होकर उन्होंने उस पुष्प को तोड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
अचानक ही उस पुष्प वृक्ष से आवाज आई -"मुझे छूना मत। मुझे मत छूना। वर्ना मुसीबत में पड़ जाओगे।"
"मुझे सिर्फ वही छू सकता है जिसका मन साफ तथा पवित्र हो साथ ही वह परोपकारी भी हो। "
"तो क्या मेरा कर्म परोपकारी और पवित्र नहीं है ?" अहंकार से राजा ने पूछा।
"हो सकता है राजन, लेकिन इसकी परख तो मुझे छूने के बाद ही हो सकती है। " मुस्कुराते हुए पुष्प-वृक्ष ने कहा।
"तब तो मै तुम्हे अवश्य छू कर देखूंगा। " गर्व से राजा ने कहा।
"सोच लो राजन। कही बाद में पछताना न पड़े। " चेतावनी देते हुए पुष्प ने कहा।
"सोच लिया मैंने। अच्छी तरह सोच लिया है। " इतना कहते हुए राजा ने अपना हाथ उस विचित्र पुष्प-वृक्ष की और बढ़ा दिए। उसका स्पर्श करते ही उन्हें एक झटका लगा। उसमे से अनगिनत चिंगारी निकली और राजा के हांथो में समां गई।
राजा ने चीखते हुए अपने हाथ को पीछे खींच लिया।
मंत्री गण आपस में बड़बड़ाने लगे की राजा के हाथ का रंग तो नीला पड़ने लगा है।
तभी पुष्प-वृक्ष में से आवाज आई -"क्यों राजन! मैंने तुम्हे कहा था की सोच समझ कर हाथ लगाना पर तुम नहीं माने। "
राजा का अहंकार चूर चूर हो गया। उसने गलती स्वीकार करते हुए पुष्प-वृक्ष से माफ़ी मांगी तथा अपना हाथ ठीक करने का उपाय पूछा।
पुष्प-वृक्ष ने जवाब दिया -" जब तक परोपकारी तथा पवित्र कर्मवाला व्यक्ति मुझे स्पर्श नहीं कर लेता तब तक तुम्हारा हाथ का नीलापन दूर नहीं हो सकता। "
इतना सुनते ही राजा ने अपने राज्य में ऐलान करवा दिया की जो व्यक्ति पुष्प-वृष को स्पर्श करके, अपने आपको पवित्र और परोपकारी कर्मवाला सिद्ध कर देगा उसे मुह्मांगा इनाम दिया जायेगा।
सुचना सुनकर बहुत से लोग पुष्प-वृक्ष के पास आये पर उनका हाल भी राजा जैसे ही हुआ और चिंगारी से उनके हाथ भी नीले पड़ गए।
काफी समय बीत गया परन्तु कोई भी अपने आप को पवित्र और परोपकारी सिद्ध नहीं कर पाया, इसकी वजह से राजा का स्वास्थ्य भी दिनोदिन ख़राब रहने लगा।
एक दिन पुष्प-वृक्ष को देखने के लिए बगीचे में भीड़ लगी थी। लोग आपस में धक्का मुक्की देने में लगे थे।
तभी एक मोची भी वह आया और जिज्ञासा से पुष्प-वृक्ष को देखने लगा, तभी वह उपस्थित दरबारी में कहा -"इतने ऊँचे लोगो में यह मोची कहा से आ गया ?"
धक्के के कारण मोची ने अपना संतुलन खो दिया और वह विचित्र पुष्प-वृक्ष से टकरा गया। लेकिन यह क्या ? उसे पुष्प-वृक्ष से कोई नुकसान नहीं पंहुचा न ही कोई चिंगारी ने उसके हाथ को नीला किया।
यह देखकर सभी आखे खुली रह गई।
किसी ने दौड़कर यह सुचना राजा को दी। राजा हर्ष के साथ बगीचे में पंहुचा और श्रध्दा से राजा उस मोची के समक्ष नत मस्तक हो गया।
तभी वृक्ष से आवाज आई -"राजन! यही है वह व्यक्ति जिसका कर्म पवित्र और परोपकारी दोनों है। इसमें न तो कोई छल कपट है और न ही अहंकार की भावना। यह समान भाव से, सभी के लिए कर्म करता है चाहे वह राजा हो या रंक। इसके मुझे छूने से तुम्हारा तथा तुम्हारी प्रजा के हाथो का नीलापन भी दूर हो जायेगा। "
यह सुनते ही राजा प्रसन्न हो गया और उसे अपनी गलतियों का अहसास भी हो गया।
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