जैन धर्म
जैन धर्म का भारतीय इतिहास में बहुत बड़ा योगदान है। जैन धर्म के अंतर्गत आने वाले तीर्थकरो का प्रभाव भारतीय संस्कृति पर देखने को मिलता है , जैन धर्म में 24 तीर्थकर थे जिसमे प्रमुख नाम महावीर स्वामी का है। प्रतियोगी परीक्षाओ की तैयारी को देखते हुए महत्वपूर्व परीक्षा उपयोगी तथ्यों को यहाँ समाहित किया गया है।उम्मीद है पाठको को यह भारतीय इतिहास तथा संस्कृति से जुड़ा बिंदु पसंद आएगा।
- जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर तथा संस्थापक ऋषभदेव जी थे।
- जैन धर्म के 23 वे तीर्थकर पार्श्वनाथ जी थे जो की कशी के राजा अश्वसेन के पुत्र थे। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में सन्यास जीवन को स्वीकार किया। इनके द्वारा दी गई शिक्षा में हिंसा न करना, सदा सत्य बोलना, चोरी न करना, सम्पति न रखना है।
- महावीर स्वामी जैन धर्म के 24 वे तथा अंतिम तीर्थकर थे।
- महावीर जी का जन्म 540 इसा पूर्व में कुंडग्राम (वैशाली) में हुआ था। इनके पिता सिद्धार्थ तथा माता त्रिशला थे।
- महावीर जी की पत्नी यशोदा तथा पुत्री का नाम प्रियदर्शिनी था। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। 30 वर्ष की आयु में माता पिता की मृत्यु के पश्चात अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से अनुमति लेकर सन्यास जीवन को स्वीकारा।
- 12 वर्ष की कठिन तपस्या के पश्चात महावीर जी को साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ। इसी समय से महावीर, जिन (विजेता) कहलाये।
- महावीर के प्रथम अनुयायी इनके दामाद (प्रियदर्शिनी के पति ) जमील बने।
- महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरो में विभाजित किया था।
- आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गन्धर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा और जो जैनधर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ।
- लगभग 300 ईसा पूर्व मगध में भीषण अकाल पड़ा जो की 12 वर्ष का था जिसके कारण भद्रबाहु अपने शिष्यों सहित कर्नाटक चले गए। किन्तु कुछ कर्नाटक ही रुके। भद्रबाहु के वापस लौटने पर मगध के साधुओ के साथ उनका गहरा मतभेद हो गया। जिसके परिणाम स्वरुप जैन समुदाय दो भागो में विभक्त हो गया जो की श्वेताम्बर और दिगम्बर कहलाये। भद्रबाहु के शिष्य दिगम्बर (नग्न रहने वाले ) तथा स्थूलभद्र के शिष्य श्वेताम्बर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले ) कहलाये।
- जैन धर्म के तीन रत्न या त्रिरत्न है जो की सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान तथा सम्यक आचरण है। त्रिरत्न के अनुशीलन में निम्न पांच महाव्रतो का पालन अनिवार्य है जिसमे अंहिंसा, सत्यवचन, अस्तेय, अपरिग्रह तथा ब्रम्हचर्य है।
- जैन धर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है। जैन धर्म में आत्मा की मान्यता है।
- महावीर पुनर्जन्म तथा कर्मवाद में विश्वास करते थे। जैन धर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारो को सांख्य दर्शन से ग्रहण किया।
- जैन धर्म मानने वाले राजाओ में उदयिन, चन्द्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश, खारवेल, अमोघवर्ष तथा चंदेल शासक है।
- मैसूर के गंग वंश के मंत्री चामुंड के प्रोत्साहन से कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में 10 वी शताब्दी में विशाल बाहुबली की मूर्ति (गोमतेश्वर की मूर्ति ) का निर्माण किया गया।
- खजुराहो में जैन मंदिरो का निर्माण चंदेल शासको द्वारा किया गया।
- मथुरा कला का सम्बन्ध जैन धर्म से है। जैन तीर्थकरो की जीवनी भद्रबाहु द्वारा रचित कल्पसूत्र में है।
- 72 वर्ष की आयु में महावीर की मृत्यु (निर्वाण) 468 ईसा पूर्व में बिहार राज्य के पावापुरी (राजगीर) में हो गया।
- भल्लराजा सृस्तिपाल के राजप्रासाद में महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था।
- जैन धर्म के सप्तभंगी ज्ञान के अन्य नाम स्याद्वाद और अनेकांतवाद है।
- प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चंपा थी। मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्द केंद्र था।
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